श्रमिकों में ‘स्व’ जागृत करने वाले राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी
स्वदेशी आंदोलन के प्रणेता अंत्योदय हितकारी विचारों वाले स्वर्गीय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी का परिचय यह नहीं है कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक थे। उनका परिचय यह भी नहीं है कि वे महान वक्ता, दार्शनिक, कुशल संगठक और विचारक थे। उनका सम्पूर्ण परिचय यह है कि वे प्रगतिशील भारत का स्वप्न कपोल कल्पना की दृष्टकोण से नहीं देखते थे, उसे साकार करने का सूत्र सुझाते थे। वे श्रमिकों को अपने अधिकारों के लिए लड़ना सिखाने के साथ ही उद्योगों को जीवित रखने का मार्ग दिखाते थे। यही उनका सर्वोचित परिचय है, जहां वे अपने विचारों के प्रकाश से श्रमिकों का समग्र विकास प्राप्त करने का लक्ष्य हासिल करने के साथ ही स्वदेशी भाव को वैश्विक पटल पर विस्तार देने का भी प्रचूर प्रचार करते थे।
शिक्षा प्राप्त करने में प्रवीण ठेंगड़ी जी को संघ रूपी विशाल वटवृक्ष के सानिध्य में आने का अवसर मिला तो उन्होंने ‘स्व’ की प्रेरणा को आत्मसात कर लिया। उन्हें संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरूजी का भी विशेष मार्गदर्शन प्राप्त था। यही कारण होगा कि वह भारतीयता के विशाल एवं समग्र धरोहर को जीते हुए अपने विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करने लगे। उनके भाषणों में शब्दों के चयन में ही स्वदेशी को निखारने का संकल्प स्पष्ट झलकता था। वे सदैव राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए समाज का निर्माण करने का संदेश देते रहे।
देश की आजादी के बाद जब स्वतंत्र भारत की प्रगति की दिशा में वैचारिक द्वंद्व का दौर चल रहा था, तब ठेंगड़ी जी ने राष्ट्रीयता को प्रधान रखते हुए स्वदेशी के भाव को बल देने का कार्य किया। उस कालखंड में जब पश्चिमी विचारों को प्रमुखता देने के साथ ही भारतीयता से ओतप्रोत संस्कारों को नगण्य मानने का चलन जोर पकड़ रहा था। साम्यवाद की राह पर चलते हुए देश निर्माण के लिए दिशा–निर्देश तैयार किये जा रहे थे, तब ठेंगड़ी जी ने भारतीय संस्कृति को अपनाते हुए प्रगतिशील भारत के विचार को धरातल पर लाने का साहसी कार्य किया।
10 नवंबर, 1920 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के अरवी में जन्मे दत्तोपंत ठेंगड़ी महज 12 वर्ष की आयु में महात्मा गांधी के अहिंसा आंदोलन में शामिल हाे गए थे। आगे चलकर उन्होंने भारतीय मजदूर संघ (1955), भारतीय किसान संघ (1979), सामाजिक समरसता मंच (1983) और स्वदेशी जागरण मंच (1991) जैसे अनेक संगठनों की स्थापना करते हुए संगठन निर्माणशैली का लोहा मनवाया।
एक दौर था जब देश के सर्वांगीण विकास पथ पर साम्यवादी विचारधारा वालों का एकाधिकार सा था। मजदूर वर्ग असमंजस में था। वह यह तय नहीं कर पर रहा था कि किस मार्ग पर चलते हुए स्वयं के उत्थान करे। उसे झूठी क्रांति के नाम पर विद्रोही बनाया जा रहा था। यानी देश के समग्र विकास को अनदेखा करते हुए उद्योगपतियों को ही लाभ देने वाला सिस्टम तैयार किया जा रहा था। कहीं–कहीं तो उद्योगों की बलि देकर मजदूरों को सड़क पर लाने का काम किया जा रहा था। मजदूर वर्ग भी नकली क्रांति की इस आग में अपना भविष्य जला रहे थे। कानपुर में लाल इमली जैसी बंद पड़ी मीलें इस तथ्य को बल देती हैं। ऐसे विरोधाभासी वातावरण में ठेंगड़ी जी ने वर्ष 1955 में भारतीय मजदूर संघ की स्थापना कर श्रमिक वर्ग का मार्गदर्शन कर उनमें राष्ट्रीय विचारों के बीज बोते हुए उचित अधिकार प्राप्ति के लिए संघर्ष करने का बोध कराया। आज भारतीय मजदूर संघ विश्व का सबसे बड़ा श्रमिक संगठन है, जो बुलंद भारत की गाथा लिखने में बड़ा योगदान दे रहा है।
तमाम प्रकार के अभावों से ग्रस्त तत्कालीन भारत देश में उन्होंने गरीबी के समूल उन्मूलन के लिए ‘पूंजी प्रधान’ विचारों के स्थान पर एक नया सूत्र प्रतिपादित किया। उस सूत्र का नाम है ‘श्रम प्रधान’, जो आज भी प्रासंगिक है। वह किसी भी आंदोलन को भारतीयता से जोड़कर उसे व्यापक स्वरूप देते हुए समस्या का समाधान करते थे। ऐसा ही एक प्रसंग यहां जानना आवश्यक है। हुआ यूं कि एक बार इंश्योरेंस सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों का देशव्यापी आंदोलन शुरू हो गया। इसमें भारतीय मजदूर संघ भी शामिल था। वहीं, श्रमिकों को पथभ्रष्ट करने के लिए जानी जाने वाली वामपंथी संगठन भी सक्रियता से आंदोलन को आगे बढ़ा रहे थे। दोनों संगठनों की मांग कमोबेश एक सी थी। मगर दोनों के विचारों में बड़ा अंतर था। एक ओर जहां भारतीय मजदूर संघ अपने भाषणों में भारत माता की जय का उद्घोष कर रहे होते थे तो दूसरी ओर सीटू एवं अन्य कम्यूनिस्ट विचारधारा के कार्यकर्ता इंक़लाब जिंदाबाद के नारे बुलंद कर रहे थे। अब प्रश्न खड़ा हो गया कि भारत माता की जय का नारा इस आंदोलन में बंद कर दिया। इस पर ठेंगड़ी जी ने दो टूक की बात करते हुए कहा कि ऐसा हुआ तो वे इस आंदोलन से हट जाएंगे। यह सुनकर सभी पूर्व की भांति आंदोलन करते रहे। अब प्रश्नकाल का दौर विपक्षी विचारधारा के संगठनों में कौंध गया। वहां आवाज उठने लगी कि जो नेता अपने भाषणों में भारत को प्रमुखता नहीं देते, भला वे भारतीयों को क्यों स्वीकार करेंगे। यानी वे भले ही भारत में आंदोलन कर रहे हैं लेकिन वे राष्ट्रीयता का भाव नहीं रखते। इसी के साथ भारतीय मजदूर संघ के एक छोटे से प्रयास ने कम्यूनिस्टों एवं अन्य समाजवादियों की कलई खोल दी।
सादा जीवन उच्च विचार के प्रबल उदाहरण, व्यापक अध्ययन कौशल के धनी, लक्ष्य प्राप्ति तक सतत प्रयास करने वाले ठेंगड़ी जी ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के भी संस्थापक सदस्य रहे हैं। उनके भाषणों में एक ऐसा खिंचाव था कि स्व की खोज करने वाला हर उम्रवय का व्यिक्त उनसे प्रेरित होकर स्वदेशी के अभियान में न्यौछावर होने को तत्पर हो जाता था।
यह भी एक विचित्र संयोग है कि ठेंगड़ी जी महान संगठक वक्ता होने के साथ ही कुशल लेखक भी थे। उन्होंने अपने विचारों का समग्र आलोक जहां भाष्य रूप में सबके सामने प्रस्तुत किया तो उसे हिंदी की कमोबेश 35, अंग्रेजी की 10 और मराठी भाषा में तीन पुस्तकों में सहेजने का भी महान कार्य किया है। इसका एक कारण यह भी है कि मात्र सातवीं-आठवीं कक्षा से ही संघ की शाखाओं में जाने वाले ठेंगड़ी जी का बौद्धिक विकास प्रचारकों ने किया था। सम्भवत: यही कारण है कि मात्र हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने से पूर्व ही उन्होंने अनेकानेक वैचारिक पुस्तकों का अध्ययन कर ज्ञान को स्वयं में समाहित करने का तप किया था।
33 से अधिक देशों का भ्रमण करने के साथ ही उन्होंने विश्व पटल में व्याप्त विचारधाराओं पर विस्तार से मंथन कर उनमें निहित कमियों को उजागर करते हुए राष्ट्रीय विचारधारा को आत्मसात किया। यही नहीं करीब 32 विविध संगठनों में सहभागिता करने वाले ठेंगड़ी जी 17 अलग-अलग संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हुए। राजनीति क्षेत्र में अपनी प्रतिभा से आलोकित करते हुए उन्होंने विभन्न पदों का कुशलतापूर्वक दायित्व संभाला।
भारतीय मजदूर संघ के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण में प्रवीणता प्रतिभाग करने वाले दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के कार्यकाल में विश्व के करीब एक-तिहाई हिस्से में साम्यवादी विचारधारा का प्रभुत्व था। उस समय भारत में भी एक नारा गूंजता था, ‘लाल किले पर लाल निशान’। यह स्पष्ट संकेत था कि उस समय राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ आगे बढ़ना कितना दुष्कर था। फिर भी ठेंगड़ी जी की प्रखर नेतृत्वशैली, राष्ट्रवादी सोच, ओजस्वी भाषा, सादगी से परिपूर्ण व्यवहारशैली और आत्मीयता से ओतप्रोत आदर्शवादी दृष्टिकोण ने असम्भव को सम्भव कर दिखाया। यही कारण है कि 1920 से 1947 के बीच अनेक श्रमिक संगठन अब इतिहास बन चुके हैं। मगर 1955 में बने भारतीय मजदूर संघ आज भी श्रमिकों का प्रतिनिधित्व कर रहा है। संघ की विचारधारा वाले इस संगठन ने ही नारा दिया था, ‘लाल गुलामी छोड़ो, वंदे मातरम बोलो’।
राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के कुछ प्रमुख विचार…
- रोजगार हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।
- हम इस विचार से सहमत नहीं हैं कि पश्चिमी प्रतिमान ही प्रगति और विकास का सार्वभौमिक मॉडल है।
- हम यह नहीं मानते कि आधुनिकीकरण पश्चिमीकरण है। बस, स्व का भाव होना जरूरी है।
- श्रमिकों, दुनिया को एक करो।

नीरज तिवारी













