सूरज को अर्घ्य देकर
लौट गए हैं वे सब
जिनके पंखों में बंधी हैं
शहर की बेचैनियाँ।
गाँव के मुहाने पर
एक घर ताकता है राह
जिसके ताले पर जम गयी है काई
और खुली खिड़कियाँ
देखती रहती हैं दिन-भर
उस पगडंडी को
जो अब सुनसान है।
ओसारे की एक दीवार
टेक लगाये बैठी है दूसरी पर
जैसे कोई बूढ़ा थामता हो
दूसरे का हाथ।
धूप भी अब यहाँ
ठहर कर ऊँघती है दोपहर-भर।
दालान में पसरा है सन्नाटा
इतना घना
कि दीवारों की दरारों से रिसता है
और कोने में रखा एक पुराना संदूक
साँस रोके सुनता है
बाहर झरते पत्तों की आवाज़।
कहते हैं, समय बीतता है
पर समय तो यहीं ठहरा है
इस गिरती हुई छत में
दीवार की टेक में
चूल्हे की बची हुई राख में।
हम ही हैं जो बीत जाते हैं
मौसमों की तरह, पानी की तरह।
शायद कि लौट आएँ फिर
वे थके हुए पंख
और इस घर की आँखों में
फिर से जले एक दीप…
शायद…


डॉ. देवेन्द्र नाथ तिवारी













