भारत अखण्ड रहे

फूँको मन्त्र चेतना के, राष्ट्रवासियों के उर,

त्यागिये प्रमाद, प्रेम-ज्योति को जलाइये।

करें दूर जातिवाद, भाषावाद, प्रान्तवाद,

देशभक्ति-भावना की साधना सिखाइये।

लक्ष्यहीन  युववृन्द  घूमते-भटकते  हैं,

राणा-शिवा औ’ सुभाष उनको बनाइये।

मेटें देशद्रोहियों को, छाँटे उनके विचार,

मिलजुल भारत को अखण्ड बनाइये।

राष्ट्र बलि-वेदिका में कितने सपूत गये,

कितने सपूत अभी और माँ चढ़ाना है !

त्याग की ऐ प्रतिमूर्ति, ममतामयी हे माता !

कितने प्रसून अभी राह में बिछाना है !!

जिनके स्वरों का नाद भर दे पराक्रम को,

कितने सुभाष और शिवा को लड़ाना है !

भारत अखण्ड रहे ऐसी साधना दो मातु !

शत्रु-सैन्यबल आज मूल से मिटाना है।

शिवेन्द्र प्रताप सिंह

भारत अखण्ड रहे

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