शून्य की रोमांचक यात्रा

‘शून्य की उत्पत्ति तथा उसकी उत्तरोत्तर यात्रा जिसमें विशेष रूप से गणित में दशमलव प्रणाली तथा व्यापक परिप्रेक्ष्यय में विज्ञान और प्रौद्योगिकी में शून्य की क्रान्तिकारी भूमिका अब कोई रहस्य नहीं है। वर्ष 2017 में, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के बोडलियन पुस्तकालय ने भक्षाली पांडुलिपि की रेडियो कार्बन डेटिंग का परीक्षण किया, जो भारत में ब्रिटिश राज के दौरान वर्ष 1880 में उत्तर-पश्चिमी भारत से प्राप्त एक पाण्डुलिपि थी, जो वर्ष 1917 से ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के स्वामित्व में थी, जैसा चित्र 1 से विदित है। जिस पाण्डुलिपि की रचना 324 ईस्वी-600 ईस्वी के बीच हुई थी। इस पाण्डुलिपि में कई फोलियो (भोजपत्र के पत्तों से बने) हैं जिन पर शून्य का प्रयोग की हुई गणना अंकित है।

चित्र 1: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने भक्षाली पांडुलिपि के रेडियो कार्बन डेटिंग की सूचना दी।

इस प्रकार शून्य की उत्पत्ति तथा उत्तरोत्तर यात्रा का संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है:

(1) दशमलव प्रणाली के शुरुआती दिनों में संख्याओं में शून्य का स्थानीय मान निर्धारण किया जाना।

महान गणितज्ञ आर्यभट्ट (350-476 ई.) ने अपने ग्रन्थ आर्यभटीय में ‘शून्य’ शब्द का प्रमुखता से उल्लेख किया है, जिसका प्रयोग आज भी ‘शून्य’ के लिए किया जाता है। हालाँकि, आर्यभट्ट ने दो सौ साल बाद ब्रह्मगुप्त द्वारा प्रयोग किये गये प्रतीक ‘0’ का उपयोग नहीं किया था; परन्तु उनके लेखन में ‘शून्य’ का स्थानीय मान लगभग स्पष्ट था, विशेष रूप से शून्य-गुणांक के साथ दस की घातों के लिए स्थान निर्धारण के विवरण में। शून्य की वैचारिक उत्पत्ति का मूल उद्देश्य किसी वास्तु की अनुपस्थिति को दर्शाना था, जो ‘शून्य’ का पर्याय भी था।

यह निश्चित है कि ‘शून्य’ को आर्यभट्ट (350-476 ई.) ने अपने ग्रन्थ आर्यभटीय में 4वीं शताब्दी ईस्वी में शून्य शब्द द्वारा स्पष्ट रूप से संदर्भित किया था। आर्यभट्ट ने शून्य को निरूपित करने के लिए ‘0’ चिõ के प्रयोग के बजाय उन्होंने एक बड़े बिन्दु ‘.’ का प्रयोग किया, जैसा कि भक्षाली पांडुलिपि में पाया जाता है और अल-ख्वारिज्मी की किताब हिसाब-अल-जबर-वाल-मुकाबला’ के बाद अरबी गणित में भी मिलता है।

ब्रह्मगुप्त (598-668 ई.) ने अपने उत्कृष्ट ग्रन्थों ‘ब्रह्मा-स्फुट सिद्धान्त’ तथा ‘खंड-खद्यक’ के लिए जाना जाता है। विद्वान इन्हें अरब जगत में भारत से आयात किये गये ज्ञान के प्रमुख òोत के रूप में संदर्भित करते हैं। ”ब्रह्मस्फुट सिद्धांत और खंड-उद्यक का बगदाद में लगभग 771 ईस्वी में अरबी में अनुवाद किया गया था और इस्लामी गणित व खगोल विज्ञान पर इसका बड़ा प्रभाव था।“

ब्रह्मगुप्त एक छोटे से कस्बे भीनमाल के निवासी थे जो कि वर्तमान राजस्थान राजय में स्थित है।

‘खंड-खाद्यक’ (एक खाने योग्य टुकड़ा, 665 सीई) में ब्रह्मगुप्त ने आर्यभट्ट के अहोरात्र (दिवस) के विचार को मध्यरात्रि से निर्धारित किया। ब्रह्मगुप्त ने ग्रहों की तात्कालिक गति की गणना भी की, लंबन के लिए सही समीकरण दिये और ग्रहणों की गणना से सम्बन्धित कुछ जानकारी दी। उनके कार्यों ने अरब दुनिया में गणित आधारित खगोल विज्ञान की भारतीय अवधारणा को पेश किया। उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि सभी पिण्ड जिनमें द्रव्यमान होता है, वे पृथ्वी की ओर आकर्षित होते हैं। ब्रह्मगुप्त को ‘शून्य’ और ‘दशमलव प्रणाली’ पर व्यापक ग्रन्थ की प्रथम रचना का भी श्रेय दिया जाता है।

यह ब्र्रह्मगप्त ही थे जिन्होंने पहली बार संख्या ‘शून्य’ के मूलभूत गुणों को इस प्रकार परिभाषित किया: 0+0=0; 0x0 = 0; 0÷0=0। यद्यपि अन्तिम गुण-धर्म तथ्यात्मक रूप से सही नहीं था। बाद में, 11वीं शताब्दी में भास्कराचार्य (भास्कर-द्वितीय) ने स्पष्ट किया किया शून्य से शून्य का विभाजन शून्य के बराबर नहीं है। यह एक अपरिभाषित राशि है जैसा कि आज हम इसे समझते हैं।

(2) भारत से अरब जगत और यूरोप तक ‘शून्य’ की यात्रा

710 ई. में मुहम्मद बिन कासिम द्वारा सिन विजय के साथ ही सिन्ध अरब जगत के केन्द्र बगदाद के सीधे नियन्त्रण में था।

वर्ष 1771 ई. में इन सभी ग्रन्थों को बगदाद के दरबार में ले जाया गया। तदोपरान्त महान गणितज्ञ और बगदाद की प्रसिद्ध अकादमी के निदेशक अल-ख्वारिज्मी ने इस पुस्त के अनुसार की जिम्मेदारी अल फजारी को सौंपी।

चित्र 2: पुस्तक ‘हिसाब- अल- जबर-वाल-मुकाबला’ का आवरण पृष्ठ।

महान गणितज्ञ अल-ख्वारिज्मी ने ब्रह्मगुप्त के अनुवादित ग्रन्थ पर काम किया और बाद में उन्होंने एक और पुस्तक लिखी जिसे ‘हिसाब- अल- जबर-वाल-मुकाबला’ के नाम से जाना जाता था। आधुनिक गणित में ‘एल्जेब्रा’ शब्द अरबी शब्द ‘अल-जबर’ से लिया गया है।

खंड-खद्यकम की एक अन्य पुस्तक का अनुवाद भी अरबी विद्वान अल फजारी ने 773 ई. में किया था। खंड-खद्यकम के अरबी अनुवाद को ‘जिज-अल-सिंध-हिंद’ (सिंध और हिंद की खगोलीय तालिका) के रूप में जाना जाता था।

‘शून्य’ और भारतीय दशमलव प्रणाली की शुरुआत के बाद अरबी में अंकों व संख्या प्रणाली और गणना में अत्यधिक परिवर्तन हो गया था, इतना अधिक कि अरबी में अंकों और तालिकाओं को अब ‘हिंदसा’ कहा जाता था, जिसका अर्थ है ‘जो भारत से आया’। आज भी अरबों में अंकों और पहाड़ों को ‘हिंदसा’ कहा जाता है।

आधुनिक विज्ञान अल-ख्वारिज्मी और उनके योगदान को समृद्ध श्रद्धांजलि देता है, ‘एल्जेब्रा’ और ‘एल्गोरिदम’ जैसे नामकरण से महसूस किया जा सकता है।

अगले 400 वर्षों में ‘हिसाब- अल- जबर’ अब यूरोप में भी प्रसिद्ध हो गयी थी। एक इतालवी वैज्ञानिक फिबोनाची ‘पीसा के लियोनार्डो’ ने वर्ष 1202 ईस्वी में इस लैटिन संस्करण का लैटिन में अनुवाद किया।

चित्र 3: फिबोनाची और पुस्तक की छवि- ‘लाइबर अबाची’ (पुनर्मुद्रित संस्करण)

पुस्तक का शीर्षक था- ‘मध्ययुगीन युग में फिबोनाची की ‘लाइबर अबाची’ गणित की सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तक में से एक थी, जिसे तब पूरे यूरोप में हिन्दू-अरबी अंकों और विधियों के रूप में जाना जाता था। ‘लाइबर अबाची’ हिन्दू संख्या प्रणाली और अंकगणित के एल्गोरिथ्म का एक प्रमुख परिचय था जिसे बच्चे आज भी स्कूल में गणित के पाठ्यक्रमों में सीखते हैं।

(3) शून्य के प्रयोग का पहला भौतिक प्रमाण

हाल के समय तक (वर्ष 2017 तक) ‘0’ (पाठ्य संदर्भों के अलावा) के शुरुआती दस्तावेज का भौतिक प्रमाण चतुर्भुज मंदिर में एक शिलालेख था, जो ग्वालियर किले के बाहर स्थित एक छोटा मन्दिर है। मन्दिर की दीवार पर एक शिलालेख वषर्द्य 865 ई. में अंकित किया गया था।

यह सबसे पहले (ब्रिटिश) भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा रिपोर्ट किया गया था। शिलालेख शब्दशः इस प्रकार है: ”मैं मंदिर को 270ग187 हस्त भूमि ओर प्रतिदिन फूलों की 50 माला दान करने का वचन देता हूँ।“

चित्र 4: ग्वालियर का चतुर्भुज मंदिर

चित्र 5: चतुर्भुज मंदिर ग्वालियर (865 ईस्वी) में ‘0’ के शिलालेख के साथ एक पट्टिका।

शिलालेख में प्रतीक शून्य के दो उदाहरण हैं: संख्या ‘270’ तथा गुणन ‘270ग187’। जहाँ ‘270ग187’ हस्त के आधार की भूखंड का जिक्र है। जहाँ हस्त (हाथ) लम्बाई की एक इकाई है, और संख्या ‘50’ में मन्दिर को प्रतिदिन 50 फूलों की माला अपिर्द्यत करने का जिक्र है। जाहिर है कि यह किसी राजा या भूमि स्वामी द्वारा मंदिर में अंकित की गयी प्रतिज्ञा है। यहाँ शून्य को ठीक उसी तरह चिõ ‘0’ से अंकित किया गया है, हम आज भी इसका उपयोग करते हैं।

(4) ‘शून्य’ का सबसे पुराना भौतिक साक्ष्य अब ‘भक्षाली पांडुलिपि’ है

भोजपत्र (छाल) पर लिखी गयी एक पांडुलिपि जो 1881 में भक्षाली गाँव के पास मिली थी, जो उस समय ब्रिटिश भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रान्त में था जो कि अब पाकिस्तान में खैबर पख्तूनख्वा प्रान्त है। इसे एक किसान ने खेतों में जुताई करते समय पाया था, जहाँ यह पत्थरों के बीच मिली थी। सौभाग्य से खोजी गयी पांडुलिपि उचित हाथों तक पहुँच गयी और कई हाथों से गुजरने के बाद, अन्त में एक इंडोलॉजिस्ट (भारतविद) एफ. होर्नेल तक पहुँची।

‘भक्षाली पांडुलिपि’ क्या है ?

  • लिपि: शारदा (गुप्त काल- 200 ईसा पूर्व-400 ईस्वी में प्रयुक्त)।
  • भाषा (बोली): गाथा (संस्कृत और प्राकृत का मिश्रण)।
  • रचना सामग्री: गणितीय गणना

यह शारदा लिपि में और गाथा बोली (जो संस्कृत और प्राकृत की प्राचीन भारतीय भाषाओं का एक संयोजन है) में लिखा गया है। मिलने के बाद, इसे तत्कालीन पंजाब के उपराज्यपाल को भेज दिया गया, जिन्होंने इसे जाँच और प्रकाशन के लिए प्रेषित किया। पांडुलिपि एक पूर्ण दस्तावेज नहीं है। भोजपत्र छाल के वर्तमान रूप में, केवल 70 पत्ते उपलब्ध हैं। गायब फोलियो पूरी कहानी बता सकते हैं।

इससे पहले, विद्वान आर. होर्नले इस पांडुलिपि की सामग्री का विश्लेषण करने वाले पहले व्यक्ति थे। एफ.आर. होर्नले ने उपरोक्त उद्धरण में उल्लेख किया कि भक्षाली पांडुलिपि का काल खंड तीसरी और चौथी शताब्दी के बीच रहा होगा। गणित के कई अन्य इतिहासकार जैसे मोरित्ज कैंटर, ए.के. बैग, एफ. काजोरी, बी. दत्ता, एस.एन. सेन, और आर.सी. गुप्ता इस डेटिंग से सहमत थे। विद्वान् और इंडोलॉजिस्ट चन्नबसप्पा ने सबसे संभावित तिथि 200-400 ईस्वी के बीच प्रतिपादित की थी। उसी क्रम में लेखक पाँच विशिष्ट गणितीय शब्दों की पहचान करता है, जो आर्यभट्ट के कार्यों में नहीं होते हैं और उनका तर्क है कि यह 5वीं शताब्दी से अधिक पुरानी पांडुलिपि होने के तर्क का दृढ़ता से समर्थन करता है।

डॉ. होर्नले ने वर्ष 1882 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के समक्ष भक्षाली पांडुलिपि का विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने इसे 1883 में भारतीय पुरातत्व पत्रिका में प्रकाशित किया। इस पत्र का एक संशोधित संस्करण वर्ष 1888 के भारतीय पुरातत्व पत्रिका में प्रकाशित किया। 1902 में, उन्होंने भक्षाली पांडुलिपि को बोडलियन पुस्तकालय, ऑक्सफोर्ड में जमा कर दिया, जहाँ यह आज मौजूद है।

100 से अधिक वर्षों तक भक्षाली पांडुलिपि होने के बाद ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के बोडलियन पुस्तकालय ने रेडिया कार्बन डेटिंग का परीक्षण कर प्रकाशित किया (14 सितम्बर, 2017), जो कि ‘शून्य’ के गणितीय अनुप्रयोगों का सबसे प्रामाणिक और निर्णायक भौतिक प्रमाण है। मार्टिन लेवे और मार्विन पेटुक ने ‘कुशियार इब्न लब्बन’ के सिद्धान्तों की हिन्दू गणना को (विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय प्रेस, पीपी 6-7, 1965) में प्रकाशित किया।

इसी पहली बार वर्ष 1922 में जी.आर. काये द्वारा सम्पादित और प्रकाशित किया गया था। एक अन्य संस्करण में वर्ष 1995 में जापानी विद्वान ताकाओ हयाशी द्वारा भी प्रकाशित किया गया था।

चित्र 6: भक्षाली पांडुलिपि के एक फोलियों में गणना की एक छवि जो कि स्पष्ट रूप से शून्य ‘0’ को दर्शाती है। (सौजन्य: इंदिरा गांधी कला केन्द्र, नयी दिल्ली)

यह इस पांडुलिपि की रचना से पहले से हमारे पास भारतीय गणितीय ज्ञान में अन्तराल का पता लगाने के लिए उत्सुकता जगाती है। हमें 200 ईसा पूर्व से 500 ईस्वी तक ही अवधि के भारतीय गणित की बहुत कम जानकारी है।

विद्वानों ने आर्यभट्ट के जीवन काल और भक्षाली पांडुलिपि की रचना अवधि में अद्भुत साम्य पाया है।

(5) शून्य और हिन्दू दशमलव प्रणाली का सभ्यता पर दीर्घकालीन प्रभाव

परम्परागत रूप से, अरबी भाषा को उल्टे क्रम में लिखा जाता था, अर्थात् अंक और यहाँ तक की संख्याओं को भी दायें से बायें लिखा जाता था। जैसा कि अरबी भाषा में संख्याओं और गणित के किसी भी प्रारम्भिक पाठ में पाया जा सकता है:-

चित्र 7: पारंपरिक शैली में लिखे गये अरबी अंक (दायें से बायें)।

लेकिन जब किसी संख्या को दशमलव प्रणाली में लिखा जाता है, तो उसे बायें से दायें पढ़ा जाता है। उदाहरणार्थ:

चित्र 8: अरबी में लिखी गयी एक संख्या एवं उसकी समानार्थी दशमलव संख्या।

यह अरबी संख्या प्रणाली पर हिन्दू अंकों और दशमलव संख्या प्रणाली के प्रभाव का सबसे अच्छा प्रमाण है। दुनिया आज दशमलव संख्या प्रणाली को हिन्दू-अरबी संख्या प्रणाली कहती है। परम्परागत रूप से, गणितज्ञों द्वारा शून्य को एक प्राकृत (नैसर्गिक) संख्या नहीं माना जाता है। लेकिन, कम्प्यूटर विज्ञान और प्रौद्योगिकी जो कि आज विज्ञान और मानव जाति की प्रगति की रीढ़ की हड्डी है, संख्या ‘0 और 1’ की बाइनरी प्रणाली पर ही कार्य करती है। यह ‘0’ को एक प्राकृत संख्या और एक अपरिहार्य संख्या मानने के लिए बाध्य करने वाला सत्य है। सच ही है कि सामान्य रूप से विज्ञान और कणित की प्रगति और विशेष रूप से बीजगणित की कल्पना शून्य के आविष्कार के बिना नहीं की जा सकती है।

प्रो. डॉ. आलोक पाण्ड्या

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