भारत के प्राचीन एवं मध्यकालीन खगोलविद

भारतवर्ष जिस प्रकार साहित्य, धर्म-दर्शन, भाषा, शिक्षा, आदि क्षेत्रों में अपनी अग्रणी भूमिका में रहा है, ठीक उसी प्रकार ही विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में जैसे गणित, सैन्य विज्ञान, कृषि विज्ञान, रसायन, धातुकर्म, आयुर्वेद एवं ज्योतिष/खगोल विज्ञान आदि क्षेत्रों में भी सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन करता रहा है। वैसे भारत में विज्ञान की परंपरा विश्व की अग्रणी एवं प्राचीनतम वैज्ञानिक परंपराओं में एक है। भारत में विज्ञान का प्रादुर्भाव ईशा पूर्व से लगभग 3000 वर्ष पुराना या यों कहें आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व हुआ है। जिसकी प्रामाणिकता हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त सिंधु घाटी के प्रमाणों से तथा भारतवासियों की वैज्ञानिक दृष्टि व वैज्ञानिक उपकरणों के उपयोग करने के तरीके से पता चलता है।

प्राचीन काल में जिस प्रकार चिकित्सा के क्षेत्र में आचार्य चरक व सुश्रुत, रसायन के क्षेत्र में आचार्य नागार्जुन आदि ने अपना उत्कृष्ट योगदान दिया, उसी प्रकार खगोल विज्ञान क्षेत्र में जो कि भारत में ही खोजी गयी वैज्ञानिक विधा है जिसमें अनेक महान वैज्ञानिक परम्परा के ऋषियों-मुनियों ने सम्पूर्ण विश्व को नये विज्ञान का बोध कराया। भारत के ऋषि-मुनि तथा आचार्य ही उस समय के वैज्ञानिक थे। खगोल विज्ञान में किये गए शोध, अविष्कार एवं उनके प्रयोगों का वर्तमान में भी किसी-न-किसी रूप में उपयोग हो रहा है। वैदिककाल से ही भारतवासियों की खगोल विज्ञान के क्षेत्र में उत्कर्षता रही है। वैदिक भारतीयों को 27 नक्षत्रों का ज्ञान था। वे वर्ष, महीनों और दिनों के रूप में समय के विभाजन से पूर्णतया परिचित थे। भारतवर्ष की खगोल विज्ञान की यात्रा को तीन काल खंडों में विभाजित किया जा सकता है:-

वेदांग ज्योतिष काल, सैद्धांतिक खगोलिकी काल और ज़िज खगोल विज्ञान काल।

(अ) वेदांग ज्योतिष काल

ज्योतिष पर सर्व प्रथम ज्ञात भारतीय ग्रंथों में से आचार्य लगध मुनि का ‘वेदांग ज्योतिष’ एक है। यह संसार में सबसे प्राचीन खगोल विज्ञान का आधार ग्रन्थ माना जा सकता है। वेदांग ज्योतिष कालविज्ञापक शास्त्र है।

वेदांग ज्योतिष का वर्तमान स्वरूप अंतिम शताब्दी ईसा पूर्व में सम्पादित था।  लेकिन यह तर्क परंपरा तक पहुँचने का मात्र आधार हो सकता है। लगभग 700-600 ईसा पूर्व में रचित यह ग्रन्थ ज्योतिष के लिए आधारभूत है, जो कि छह वेदांग या वेदों के उपांगों में से एक है।

वेदांग ज्योतिष वेदांग ज्योतिष की विशेषता यह है कि इसमें ग्रीक खगोल विज्ञान का प्रभाव नगण्य हैं। वेदांग ज्योतिष में काल-गणना (युग या युग के कुछ हिस्सों, यानी संयोजन चक्र), 27 नक्षत्र, सौर और चंद्र ग्रहण, सात ग्रह और राशि चक्र के बारह राशियों पर चर्चा शामिल है। तथापि, वेदांग ज्योतिष में खगोल विधा के आधारभूत सिद्धांतों का विवरण नहीं मिलता है।

(ब) सैद्धांतिक खगोलिकी काल

भारत में 400 से 1400 ई0 की अवधि में विकसित हुए खगोल विज्ञान को सैद्धांतिक खगोल विज्ञान काल के रूप में वर्गीकृत किया गया है। जिसमें कई ग्रंथ लिखे गए और कई खगोलीय घटनाओं का आधार निर्धारित किया गया। प्रमुख रूप से, आर्यभट्ट, वराह मिहिर, ब्रम्हगुप्त, भास्कर-प्, लल्ला, भास्कर-प्प् और कुछ अन्य गुमनाम खगोलविदों ने भारत में खगोल विज्ञान के व्यवस्थित विकास में महती योगदान दिया।

(स) ज़िज खगोल विज्ञान काल

ज़िज का अर्थ है पंचांग या ग्रहों की स्थिति की तालिका। 13वीं से 17वीं शताब्दी की अवधि में विकसित हुए खगोल विज्ञान को ज़िज खगोलिकी काल के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसमें अनिवार्य रूप से भारत की खगोलीय परंपरा पर मुगल और इस्लामी प्रभाव शामिल हैं। इसका समापन जंतर-मंतर के रूप में जानी जाने वाली पाषाण वेधशालाओं के निर्माण के साथ हुआ और जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, बनारस और मथुरा में महाराजा सवाई जय सिंह जयपुर के खगोलशास्त्री राजा द्वारा निर्मित हुई। प्राचीन और मध्यकालीन भारत के महान खगोलविदों का संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत है:-

(1) लगध (600-700 ईसा पूर्व) 

‘लगध’ नाम के ऋषि ने ‘ज्योतिष वेदांग’ में तत्कालीन खगोलीय ज्ञान को व्यवस्थित किया था। वेदांग ज्योतिष नाम के सबसे पुराने खगोलीय ज्ञान कोष में कई खगोलीय विशेषताओं का विवरण दिया गया है, जो आम तौर पर सामाजिक और धार्मिक घटनाओं के समय के लिए लागू होते हैं। वेदांग ज्योतिष में खगोलीय गणनाओं, कैलेंडर संबंधी अध्ययनों का भी विवरण दिया गया है और अनुभवजन्य अवलोकन के लिए नियम स्थापित किए गए हैं। 600 ईसा पूर्व द्वारा लिखे गये ग्रंथ में अधिकांशतः धार्मिक रचनाएँ थीं। वेदांग ज्योतिष का भारतीय जनजीवन से संबंध है और समय और ऋतुओं के कई महत्वपूर्ण पहलुओं का विवरण देता है, जिसमें चंद्र महीने, सौर महीने, और अधिमास के चंद्र महीने (तीन साल में एक बार जोड़ा जाने वाला अतिरिक्त महीना) का समायोजन शामिल है।

(2) आर्यभट्ट (350-476 ई.)

आर्यभट्ट, “आर्यभट्टीय” और “आर्यभट्ट-सिद्धांत” के लेखक थे, जिनका हयाशी (2008) के अनुसार, मुख्य रूप से भारत के उत्तर-पश्चिम और ईरान के सासानियन राजवंश (224-651) में खगोल शास्त्र के विकास पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसकी विषय वस्तु कुछ हद तक वराहमिहिर, भास्कर-प्, ब्रह्मगुप्त (598-665 ई.) और अन्य के कार्यों में संदर्भित है। इसमें दिवस की परिभाषा दिन की शुरुआत से लेकर मध्यरात्रि तक परिभाषित है। आर्यभट्ट ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि पृथ्वी अपनी धुरी के चारों ओर घूमती है, जिससे तारों की पश्चिम की ओर एक स्पष्ट गति प्रतीत होती है। अपनी पुस्तक, आर्यभट्टीय में उन्होंने सुझाव दिया कि पृथ्वी गोलाकार है, जिसकी परिधि 24,835 मील (39,967 किमी.) है। आर्यभट्ट ने यह भी उल्लेख किया है कि चंद्रमा के चमकने का कारण परावर्तित सूर्य का प्रकाश है। आर्यभट्ट के अनुयायी दक्षिण भारत में विशेष रूप से प्रभावशाली थे, जहाँ पृथ्वी के दैनिक घूर्णन और उनके सिद्धांतों का पालन किया गया था तथा कई जनजीवन के महत्त्वपूर्ण कार्य उन पर आधारित थे। आर्यभट्ट वर्तमान समय के पटना या पाटलिपुत्र के समीपवर्ती क्षेत्र में कुसुमपुर नामक शहर में कर्मशील थे।

आर्यभट्ट ने संस्कृत वर्णाक्षरों का चार राशियों को सांकेतिक रूप में उपयोग इसी प्रकार किया था जिस प्रकार आधुनिक बीजगणित में रोमन वर्णाक्षरों का प्रयोग किया जाता है।

आर्यभट्ट ने त्रिकोणमितीय वर्णनों में ज्या एवं कोज्या की सारणियों का प्रतिपादन भी किया। इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि आर्यभट्ट ने पाई (च) का निकटतम मान भी प्रतिपादित किया था।

इससे भी रुचिकर बात यह है कि आर्यभट्ट ने तारों, ग्रहों एवं वस्तुओं की सापेक्ष गतियों को भी रेखांकित किया था। उदाहरणतः आर्यभट्ट ने इसे निम्नलिखित भावों से लिखा, ‘जिस प्रकार नाव में सवार होकर आगे जाते हुए नदी किनारे स्थिति वृक्ष एवं वस्तुएँ हमें पीछे की ओर जाते हुए प्रतीत होती है, इसी प्रकार आकाश में गति करते हुए ग्रह एवं तारे भ्रमणशील पृथ्वी की गति का आभासी प्रभाव है।

चित्र (1): इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (आईयूसीएए), पुणे में स्थापित आर्यभट्ट की प्रतिमा का एक चित्र।

(3) वराह-मिहिर (505-587 ई.)

वराह-मिहिर एक खगोलशास्त्री और गणितज्ञ थे जिन्होंने भारतीय खगोल विज्ञान के साथ-साथ ग्रीक, मिस्र के कई सिद्धांतों का अध्ययन किया। उनकी पुस्तक पंचसिद्धांतिका कई खगोलीय ज्ञान प्रणालियों से युक्त एक ग्रंथ है। कहा जाता है कि उन्हें ग्रीक खगोल विज्ञान का भी पूरा ज्ञान था। उत्तर प्रदेश में बहराइच के पास वराहमिहिर द्वारा बनाए गये कुछ मॉडलों और उपकरणों को 11वीं शताब्दी में आक्रमणकारियों ने तहस-नहस कर दिया था। जिसका अब कोई अवशेष मौजूद नहीं है।

वराहमिहिर द्वारा रचित प्रमुख ग्रन्थ ‘सूर्य-सिद्धांत’ था। वराह-मिहिर ने आर्यभट्ट द्वारा प्रयुक्त कतिपय चिन्हों व गणनाओं में अभीष्ट परिवर्तन किये थे। इसकी पुष्टि आर्यभट्ट के उपरांत आये गणितज्ञ ब्रम्हगुप्त की रचनाओं में दिए गए संदर्भों से होती है। वराह-मिहिर का कार्यक्षेत्र उज्जैन शहर था।

(4) ब्रह्मगुप्त (598-668ई.)

ब्रम्हगुप्त अपने क्लासिक ग्रंथों ‘ब्रम्हा-स्फुट सिद्धांत’ और ‘खंड-खद्यक’ के लिए जाने जाते हैं। विद्वानों का उल्लेख है कि ये ग्रंथ अरब जगत में भारत से आयात किए गए ज्ञान के प्रमुख स्रोत थे। इसका वर्ष 771 ई0 के आसपास बगदाद में अरबी में अनुवाद किया गया था और इस्लामी गणित व खगोल विज्ञान पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ा। खंड-खाद्यक (एक टुकड़ा खाने योग्य, 665 सीई) में ब्रह्मगुप्त ने आर्यभट्ट के एक और दिन के विचार को मध्यरात्रि से शुरू किया। ब्रह्मगुप्त ने ग्रहों की तात्कालिक गति की गणना भी की, लंबन के लिए सही समीकरण दिए और ग्रहणों की गणना से संबंधित कुछ जानकारी दी। उनके कार्यों ने अरब जगत में गणित आधारित खगोल विज्ञान की भारतीय अवधारणा को प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि द्रव्यमान वाले सभी पिंड पृथ्वी की ओर आकर्षित होते हैं।

ब्रह्मगुप्त राजस्थान के वर्तमान राज्य में एक छोटे से शहर भीनमाल (भीलमाल) में रहते और काम करते थे।

(5) भास्कराचार्य-प् (629-680 ई.)

खगोलीय कृति महाभास्करीय (भास्कर की महान पुस्तक), लघुभास्करीय (भास्कर की छोटी पुस्तक) और आर्यभटीयभाष्य (629 ई., आर्यभट द्वारा लिखित आर्यभट्ट पर एक टिप्पणी) के लेखक भास्कर-प् थे। वैज्ञानिक इतिहासकार हयाशी (2008) लिखते हैं, ‘ग्रहों के देशांतर, हेलियाकल उदय (सूर्योदय) और ग्रहों की स्थापना, ग्रहों एवं सितारों के बीच संयोजन, सूर्य एवं चंद्र ग्रहण और चंद्रमा की चरणगति उनके खगोलीय ग्रंथों में चर्चा किए गए विषयों में से हैं।’

भास्कर के कार्यों का अनुसरण वातेश्वर (880 सी.ई.) ने किया, जिन्होंने अपने आठवें अध्याय वातेश्वरसिद्धांत में सीधे देशांतर में लंबन को निर्धारित करने के तरीकों को तैयार किया, किसी भी समय विषुवत और संक्रांति की गति और सूर्य के चतुर्थांश का अध्ययन है।

वह प्राचीन वल्लभी शहर में रहते थे जो कि वर्तमान गुजरात प्रान्त में अवस्थित था। कई लोगों का मानना है कि भास्कर-प् ने प्राचीन वल्लभी विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया था जो कि चौथी शताब्दी ईस्वी से 710 ईस्वी तक अस्तित्व में था। यह विश्वविद्यालय 710 ईस्वी में अरब आक्रान्ताओं के आक्रमणों एवं बर्बरताओं में नष्ट हो गया।

(6) लल्ला (720-790 ई.)

सिय्याधिवद्धिदा (ग्रंथ जो छात्रों की बुद्धि का विस्तार करता है) के लेखक थे, जो आर्यभट्ट की कई धारणाओं को सत्यापित करता है। लल्ला की सिस्याधिवृद्धिदा ही दो भागों में विभाजित है:-

गृहाध्याय और गोलाध्याय। ग्रहाध्याय (अध्याय प्-ग्प्प्प्) ग्रहों की गणना, माध्य और सच्चे ग्रहों का निर्धारण, पृथ्वी की दैनिक गति से संबंधित तीन समस्याएँ, ग्रहण, ग्रहों का उदय और अस्त होना, चंद्रमा के विभिन्न पुच्छल, ग्रह और सूक्ष्म संयोजन से संबंधित है। सूर्य और चंद्रमा की पूरक स्थितियाँ।

दूसरा भाग-गोलाध्याय शीर्षक (अध्याय ग्प्ट-ग्ग्प्प्) – ग्रहों की गति, खगोलीय उपकरणों, गोलाकारों के चित्रमय प्रतिनिधित्व से संबंधित है, और त्रुटिपूर्ण सिद्धांतों के सुधार और अस्वीकृति पर जोर देता है। लल्ला को आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कर प् का प्रभाव विरासत में मिला था। उनके योगदान के बाद के खगोलविदों श्रीपति, वातेश्वर और भास्कर प्प् ने उनका अनुसरण किया। लल्ला ने सिद्धांत तिलक की रचना भी की।

लल्ला वर्तमान गुजरात के उत्तरी भाग में रहते और काम करते थे।

यहाँ यह स्पष्टीकरण करना अपेक्षित है कि खगोलशास्त्री लल्ला (लल्ला, लल्लेश्वरी, 1320-1392) कश्मीर की भक्ति कवि, जो एक महिला थीं, से अलग हैं।

(7) शतानंद (1068-1099 ई.)

शतानंद का जन्म पुरी में हुआ था। वह बड़ा हुआ और केसरी वंश के दरबार में सेवा की। उन्होंने क्लासिक पाठ ‘भाववती’ यानी ‘अनुमानित पूर्वता’ लिखा था। उन्होंने सूर्य ग्रहण और ग्रहों की गति की समय अवधि की सारिणी व पंचांग अर्थात् कैलेंडर भी तैयार किये। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन उज्जैन में बिताया और वही रहकर अपना कार्य सम्पादित किया।

(8) भास्कराचार्य-द्वितीय (1114-1185 ई.)

भास्कराचार्य-द्वितीय सिद्धांतशिरोमणि (सटीकता का प्रमुख गहना) और करकुटथला (खगोलीय चमत्कारों की गणना) के लेखक थे। उन्होंने उज्जैन स्थित वेधशाला में अपने शोध में उपयोग किए गए ग्रहों की स्थिति, संयोजन, ग्रहण, ब्रह्मांड विज्ञान, भूगोल, गणित और खगोलीय उपकरणों के अपने अवलोकनों का नेतृत्व किया एवं उनपर अपना दस्तावेज तैयार किए।

भास्कर-द्वितीय के योगदान में तीन प्रमुख पुस्तकें “लीलावती”, “बीजगणित” और “सिद्धांत शिरोमणि” शामिल हैं। उनके योगदान में सबसे प्रसिद्ध उनकी पुस्तक- ‘लीलावती’ है। उनकी पुत्री का नाम भी लीलावती था।

मुग़ल बादशाह अकबर के दरबार में रहने वाले फ़ैज़ी दरबारी और कवि ने भी भास्कर की बेटी लीलावती के बारे में उल्लेख किया है। भास्कर ने अपनी बेटी लीलावती की जन्म-कुंडली बनाई। उन्होंने अपनी बेटी की शादी के लिए सबसे शुभ समय की गणना की थी।

अपनी गणना का उत्सव मनाने के लिए भास्कर ने लीलावती को समर्पित एक गणितीय पाठ लिखा। लीलावती स्वयं एक अच्छी गणितज्ञ सिद्ध हुईं। भास्कर ने अपनी बेटी के नाम के बाद क्लासिक पाठ लीलावती का हकदार बनाया। लीलावती में अंकगणित और बीजगणित में विचार शामिल हैं जो उस युग में बहुत उन्नत थे। वह इसकी भविष्यवाणी नाटकीय ढंग से करना चाहते थे। भास्कर ने पानी की कटोरी में  एक छेद के साथ एक प्याला रखा, जिसे इस तरह से बनाया गया था कि अनुकूल समय आने पर वह डूब जाए। प्राचीन भारत में इस तंत्र पर आधारित जल घड़ियाँ (क्लीप्सीड्रा) हुआ करती थीं।

लेकिन ऐन वक्त पर जैसे ही लीलावती कटोरे पर झुकी, उसकी गर्दन से एक मोती प्याले में गिर गया और प्याले में छेद उस मोती से अवरुद्ध हो गया। प्याला नहीं डूबा, जिसका मतलब था कि लीलावती कभी विवाह नहीं कर सकती थी। इस प्रकार भविष्यवाणी सही साबित हुई! उनका जन्म एक गाँव में हुआ था जो वर्तमान कर्नाटक का हिस्सा है, और उज्जैन में उनकी मृत्यु हो गई जहाँ उन्होंने अपने अधिकांश योगदानों पर काम किया।

(9) श्रीपति (1039-1066 ई.)

श्रीपति एक खगोलशास्त्री और गणितज्ञ थे, जिन्होंने ब्रह्मगुप्त स्कूल का अनुसरण किया और 20 अध्यायों में सिद्धांतशेखर (द क्रेस्ट ऑफ एस्टाल्ड डॉक्ट्रिन) को लिखा, जिससे चंद्रमा की दूसरी असमानता सहित कई नई अवधारणाओं को प्रकाशित किया।

वह उस क्षेत्र में रहते थे जो अब वर्तमान महाराष्ट्र का हिस्सा है।

(10) महेंद्र सूरी (1340- 1410ई.)

महेंद्र सूरी ने यंत्र-राज (इंस्ट्रूमेंट्स का राजा, 1370 ई0)- संस्कृत में उत्कीर्ण यंत्र राज की रचना की व इसे 14 वीं शताब्दी के तुगलक वंश के शासक फिरोज शाह तुगलक (1351-1388 ई0) के शासनकाल के दौरान भारत में प्रस्तुत किया। उल्लेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि सूरी फिरोज शाह तुगलक की सेवारत एक जैन खगोलशास्त्री थे। 182 श्लोक यंत्र-राज के पहले अध्याय में एस्ट्रोलैब (यंत्र-राज) का उल्लेख किया है एवं एस्ट्रोलैब को चित्रित करने के लिए एक संख्यात्मक तालिका के साथ एक मौलिक सूत्र भी प्रस्तुत किया, हालांकि प्रमाण स्वयं सिद्ध नहीं है। 32 तारों के देशांतर के साथ-साथ उनके अक्षांशों का भी उल्लेख किया गया है। महेंद्र सूरी ने सूक्ति, भूमध्यरेखीय निर्देशांकों और अण्डाकार निर्देशांकों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। महेंद्र सूरी के कार्यों ने केरल स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी के पद्मनाभ जैसे बाद के खगोलविदों को प्रभावित किया था।

चित्र : जयपुर में जंतर-मंतर वेधशाला में संरक्षित एक एस्ट्रोलैब (यंत्र-राज) का एक चित्र।

  1. आर. कोचर और जे.वी. नार्लीकर, एस्ट्रोनॉमी इन इंडिया, इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी (1994)।
  2. आर. कोचर और जे. वी. नार्लीकर, एस्ट्रोनॉमी इन इंडिया: पास्ट, प्रेजेंट एंड फ्यूचर, आईयूसीएए पुणे और आईआईए बैंगलोर (1993)।
  3. डी.एम. बोस, एस.एन. सेन और बी.वी. सुब्बारायप्पा, भारत में विज्ञान का संक्षिप्त इतिहास, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (आईएनएसए, 1971)।

डॉ. शिव कुमार मिश्र

भारत के प्राचीन एवं मध्यकालीन खगोलविद

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