धर्मांतरण की पृष्ठभूमि और हिन्दू-प्रतिरोध
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई। संघ की स्थापना का मूल कारण अपने देष की संस्कृति और अस्मिता की रक्षा करना था। धनवान, बलवान, बुद्धिमान, चरित्रवान, विद्यावान इत्यादि सभी प्रकार के सद्गुणों से पूर्ण होने पर भी हमारा देष विदेषियों की जय-पराजय के खेल में शताब्दियों तक उलझा रहा। निष्कर्षतः व्यक्तिगत सद्गुणी मूल्यों के बावजूद राष्ट्रीयता की सोच में देष पराधीन रहा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्रीयता की सोच में देष स्वाधीन करने के लिए और राष्ट्र के साथ व्यक्ति-निर्माण करके उसको चिरस्थायी बनाने के संकल्प के साथ कार्य आरम्भ किया। यद्यपि विनाषकारी दूषित सोच और नीति के चलते देष टुकड़े-टुकड़े होकर 1947 में औपचारिक रूप से स्वतन्त्र हुआ।
बदली परिस्थितियों में सन् 1950 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने कार्य में से ‘भारत स्वतन्त्र करेंगे’ के स्थान पर हिन्दू धर्म, संस्कृति और समाज का संरक्षण और हिन्दू राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति को अपनाया। संघ ने राष्ट्र सहित व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व निर्माण में शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को स्थान दिया। संघ इस आयाम के साथ 1989 तक चला। परन्तु समय सापेक्ष आने वाली चुनौतियों के आलोक में विविध आयाम संघ की योजना में जुड़े- जैसे संवेदनषीलता, समाज अपना है, दुष्प्रचार से प्रभावित नहीं होना चाहिए, समन्वय और समरसता आदि। इन आयामों के साथ संघ का व्यक्तित्व निर्माण का कार्य चलता रहा है। इसके लिए कार्य विभागों की अनेक योजना बनी जैसे शारीरिक, बौद्धिक व्यवस्था, सेवा, सम्पर्क, प्रचार आदि। समन्वय और समरसता सभी कार्य विभागों का विषय रहा है।
संघ 1989 से अपने कार्य-क्षेत्र के दायरे को और बढ़ा रहा है। जहाँ समस्या थी और उनके सहज समाधान होने चाहिए थे, विकल्पाभाव में संघ ने सभी समस्याओं को अपने स्वयंसेवकों के माध्यम से हल करने का प्रयत्न किया है। जैसे जनगणना के माध्यम से यह समस्या ध्यान में आयी कि लगातार हिन्दू जनसंख्या कम हो रही है और इसकी चर्चा भी होती है कि देष की जनसंख्या बढ़ रही। इस बढ़ते हुए जनसांख्यकीय असन्तुलन का एक प्रमुख कारण धर्मान्तरण का है। यद्यपि धर्मान्तरण तो भारत देष में पहली बार 712 ई. में हुआ।
आधुनिक भारत का इतिहास जिसे अंग्रेजों ने प्रथमतः लिखा। फ्रांस की राज्य क्रान्ति के पष्चात् भागकर भारत आये पादरी अबे डुर्बोइ ने भारत के विषय में अध्ययन करके एक रिपोर्ट बनायी। इस रिपोर्ट को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की मीटिंग में पढ़ा गया। उसका भावानुवाद यह है कि ‘यदि भारत परम्पराओं के साथ जीता रहा तो हमें शीघ्र ही भारत छोड़कर अपने देष जाना पड़ेगा’। इस रिपोर्ट से यह निष्कर्ष निकला कि जहाँ से परम्परा परिपोषित होती है, उस मूल व्यवस्था को ही विकृत कर देना चाहिए। अंग्रेज इसमें लग गये।
इतिहास विकृत किया जेम्स मिल ने, षिक्षा विकृत की मैकाले ने, भाषा विकृत की मैक्समूलर ने, राजनीति ए.ओ. ह्यूम ने, जनगणना करायी मेयो ने। जेम्स मिल की इतिहास दृष्टि के अनुसार भारत में छः विदेषी जातियों का आक्रमण हुआ। यूनानी, शक, कुषाण, हूण, मुसलमान और ईसाई। प्रथम चार जातियाँ या तो भारत से भागी और दुनिया से ही मिट गयीं या भारत की धर्म-संस्कृति को अपनाकर भारत के विषाल समाज में विलीन हो गयीं। किन्तु अन्तिम दो जातियों से संघर्ष आज भी चल रहा है। अन्तिम दो अर्थात् मुसलमान और ईसाई का इनसे संघर्ष जारी है। इन्होंने हिन्दू समाज को पतनषील बनाया।
जहाँ तक मुसलमानों द्वारा हुए धर्मांतरण का प्रष्न है, तो यह मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण ई. सन् 712 से प्रारम्भ हुआ। यहीं से भारत के इस्लामीकरण की प्रक्रिया आरम्भ होती है। इसका ऐतिहासिक सन्दर्भ यह है कि मुहम्मद बिन कासिम सुन्नी मुसलमान था। वह अली के समर्थक वंषज षिया मुसलमान जो कर्बला के युद्ध में पराजय के बाद सिन्ध में शरणार्थी बनकर रह रहे थे, उनको मारने के लिए सिन्ध आया था। मुहम्मद साहब 570 ई. में मक्का में पैदा हुए। 25 वर्ष की उम्र में खदीजा नाम की महिला से विवाह किया, जो उनसे उम्र में 15 वर्ष बड़ी थी। जब मुहम्मद ने इस्लाम के विषय में कहना आरम्भ किया, तो उनका विरोध हुआ। उस विरोध के नाते वह मक्का से मदीना 622 ई. में आये। इस घटना को इस्लाम में हिजरत कहते हैं। मुहम्मद की मृत्यु 8 जून, 632 ई. को मदीना में बुखार से पीड़ित होकर हुई।
मुहम्मद के मरने के बाद इस्लाम का नेता कौन बनेगा, इसको लेकर विवाद हुआ और एक मत खड़ा हुआ जो मुहम्मद के चचेरे भाई और दामाद अली जो कि एक ही आदमी थे, को खलीफा बनाना चाहता था, वह षिया कहा गया। षिया माने गोलबन्दी होता है। पूरा वाक्य ‘षियाने अली’ है। अर्थात् अली के लिए गोलबन्दी। एक मुहम्मद के साथी जो मुहम्मद के श्वसुर थे। नाम था अबू बकर। ये ही खलीफा बने। इनको मानने वाले सुन्नी हो गये। अबू बकर की दो वर्ष की बीमारी के कारण मृत्यु हो गयी। दूसरे खलीफा उमर बने।
634 से 644 ई. तक वे ईरानियों द्वारा युद्ध में मारे गये। तीसरे खलीफा उस्मान 644-656 ई. बने। इनकी विद्रोहियों द्वारा हत्या हो गयी। चौथे खलीफा अली 565-661 ई. को बनाया गया, इसको संकटों का सामना करना पड़ा। इनकी नरवाहन के युद्ध में खारिज मुसलमानों से लड़ाई हुई। एक मुआविया नाम का सुन्नी मुसलमान था, जो अली का विरोधी हो गया। इस युद्ध में अली को बड़ी क्षति हुई। उन्होंने सब कुछ छोड़कर मस्जिद में शरण लिया। जहर भरी खंजर से उनकी नमाज पढ़ते समय हत्या कर दी। फिर हसन खलीफा बने। किन्तु उनकी भी हत्या करके मुआविया खलीफा बने और समझौता हुआ कि मुआविया के मरने के बाद अली के छोटे पुत्र हुसैन खलीफा बनेंगे। मुआविया 680 ई. में मरा और अपने लड़के यजीद को खलीफा बना गया। यह बात हुसैन को अच्छी नहीं लगी फिर कर्बला का युद्ध 680 ई. हुआ, जिसमें हुसैन मारे गये जिसकी याद में आज भी मुसलमान ताजिया उठाते हैं।
ओमान में भाविया बिन हासिम अलाफी और उनके भाई मोहम्मद बिन हारिस अलाफी ने खलीफा के विरुद्ध विद्रोह किया, जिसमें सईद मारा गया। मोहम्मद अलाफी ने अपने साथियों के साथ मकराना में शरण प्राप्त की, जहाँ सिन्ध का राज्य था। बगदाद के गवर्नर ने उन्हें कई पत्र लिखकर बागियों को उनके सुपुर्द करने के लिए कहा; लेकिन राजा दाहिर शरणागत की रक्षा करना हिन्दू धर्म है, ऐसा मानकर बागियों को देने से मना कर दिया। बगदाद के गवर्नर हुज्जाज बिन युसुफ के आदेष के चलते उसके भतीजे मुहम्मद बिन कासिम ने सिन्ध पर आक्रमण किया। दुर्भाग्य से सिन्ध के राजा दाहिर की युद्ध में मृत्यु हुई और सिन्ध की पवित्र धरती पर मुसलमानों के अपवित्र कदम पड़े। उसके बाद धर्मान्तरण का कुचक्र चला, जो मुसलमान बना, वह बचा, नहीं तो मारा गया।
मुस्लिम धर्मांतरण की पृष्ठभूमि और उसके विरुद्ध हिन्दू प्रतिरोध के सजीव सर्वोच्च बलिदान के उदहारण भी दृष्टव्य है। सिन्ध के दीवान गुन्दुमल की बेटी ने सिर कटवाना स्वीकार किया पर मीर कासिम की पत्नी बनना स्वीकार नहीं किया। राजा की पत्नियों और पुत्रियों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपनी जान दी। कासिम ने राजा दाहिर की बेटियों को तोहफा बनाकर खलीफा के लिए भेजा, तो खलीफा ने अपना अपमान समझा कि उनकी इज्जत लूट चुका है, अब खलीफा के पास भेजा है, ऐसा समझकर खलीफा ने कासिम को बैल की चमड़ी में लपेट कर दमिष्क मँगवाया। बन्द होने से वह दमघुट कर मर गया। दाहिर की तीनों बेटियों को जिन्दा दीवार में चुनवा दिया।
716 ई. में सिन्ध में हिन्दू सत्ता स्थापित हुई। बप्पारावल मूलनाम कालभोज 713-810 सिषोदिया वंष संस्थापक प्रतापी राजा आजमल नामक षिवभक्त राजा ने पाकिस्तान में रावलपिण्डी शहर का दिया। बप्पा रावल ने अरब मुस्लिमों को खदेड़ा और अपने राज्य का पष्चिम में विस्तार किया। 735 में हज्जाम ने राजपूताने पर चढ़ाई की, उनको हज्जाम के देष तक खदेड़ा और गजनी तक गये। (गजनी के संस्थापक हिन्दू राजागण थे) वहाँ के मुस्लिम शासक सलीम को पराजित किया, उसकी बेटी से विवाह किया। ईरान, इराक, तुरान, कफिरिस्तान के मुस्लिम शासकों को परास्त कर उन सभी की कन्याओं से बप्पारावल ने विवाह किया।
भारत में ईसाई धर्मांतरण भी भारत विरूपण की गहरी चाल को प्रदर्षित करता है। ईसाई भारत में केरल की तरफ से आये। पहला नाम सेण्ट थामस का है, जो केरल में धर्मान्तरण कराने के बाद तमिलनाडु में आया। यहाँ के लोगों ने उनका विरोध किया। इससे उनको गुफा में शरण लेनी पड़ी, जहाँ उनका जीवन समाप्त हो गया। चेन्नई में इस जगह पर 1523 ई. में पोर्तुगीज चर्च बना दिया गया। 1542 ई. में ईसाई प्रचारक सेंट फांसिस जेवियर आया और रोमन कैथोलिक ईसाई की स्थापना किया और भारत में इसकी आड़ में धर्मान्तरण करना प्रारम्भ किया। 1757 में ईसाईयों ने भारत में सत्ता प्राप्त किया और सत्ता को बनाये रखने के लिए प्रयत्न करना आरम्भ किये। देष में वर्ष 1857 में क्रान्ति हुई कि यह देष हमारा है। अंग्रेजों को यहाँ से जाना चाहिए।
इस घटना को भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम कुछ विद्वानों ने कहा, उसका कारण यह था कि देष में सामान्य जनता ने पहली बार एकजुट होकर यह कहा कि यह देष मेरा है। इससे पहले राजाओं की जय, देष की जय, राजा की पराजय, देष की पराजय होती थी। जनता ने पहली बार देष के लिए लड़ना शुरू किया। अंग्रेज और सतर्क हो गये। भारत पर शासन करने के लिए जोड़-तोड़ को और बढ़ा दिया। इसमें से मेयो का एक प्रयत्न जनगणना के नाम पर हुआ। मेयो ने अपने देष को यह जानकारी दी कि भारत की जनगणना करके हम इनको अलग-अलग समूहों में बाँट सकते हैं। 1872 में वह इसमें सफल हुआ।
आज हम अपने नाम के आगे जो जाति वाचक शब्द लिखते है, वह 1872 से पहले लिखा पढ़ी में नहीं थे। मेयो की जनगणना को स्थायी रूप से रिपन ने 1881 के बाद हर दस वर्ष पर कराने की व्यवस्था दी। भारत की 1941 की जनगणना के अनुसार मुसलमान 19 प्रतिषत थे। 1947 में देष बँटा तो धरती 23 प्रतिषत चली गयी। आबादी के अनुपात से भी ज्यादा धरती क्यों दी गयी ? एक बड़ा प्रष्न वर्तमान पीढ़ी के सामने है। 1951 में भारत की जनगणना हुई मुसलमान लगभग 9 प्रतिषत, ईसाई लगभग 2 प्रतिषत थे।
भारतीय हिन्दू राजाओं ने हिन्दू धर्मान्तरण का विरोध और घर-वापसी का प्रयत्न किया, जिसकी शुरुआत बप्पारावल ने की थी जो चलते-चलते छत्रपति षिवाजी महाराज तक आयी। छत्रपति के शासन में (1) ब्रह्म सभा (2) जाति सभा (3) राजा और उसका पेषवा (4) संकेश्वर और कोल्हापुर स्थित शंकराचार्य के मठ। ये चारों व्यवस्थाएँ शुद्धिकरण का कार्य करती थीं। सम्भाजी और शाहूजी आदि ने शुद्धि विषय पर बड़ा काम किया। यह राजाओं द्वारा चलने वाले प्रयत्न का अन्तिम प्रयास था। समाज के सभी महत्त्वपूर्ण नेतृत्वकर्ताओं ने धर्मान्तरण के विरोध में और वापसी के पक्ष में कार्य किया। ऋषि देवल का नाम इसमें बड़ा है। इन्होंने देवल स्मृति का निर्माण किया। वर्त्तमान में देवल स्मृति उपलब्ध है। नब्बे श्लोक है- उसमें 63 मलेच्छ शुद्धि से सम्बन्धित है।
सन्तों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। स्वामी रामानन्दाचार्य, रैदास, चैतन्य महाप्रभु आदि। स्वामी रामानन्दाचार्य ने दिल्ली के शासक गयासुद्दीन तुगलक के सामने 12 माँगें रखकर मनवाया। जैसे- जजिया कर, मन्दिरों का विध्वंस, बलपूर्वक धर्मान्तरण, गोहत्या आदि रोका जाये। स्वामी जी ने 34000 हिन्दू राजपूतों की अयोध्या के आसपास जो मुसलमान बनाये थे, उनको स्वधर्म में वापस लाये। कर्मकाण्ड करने वाले ब्राह्मण का धर्मान्तरण रोकने और वापसी करने के आरोप में दिल्ली में पहला बलिदान फिरोजषाह तुगलक के शासनकाल में हुआ। दिल्ली में एक वृद्ध ब्राह्मण अपने घर में सार्वजनिक पूजा करने का आग्रह करता था। उसकी षिकायत मुस्लिम फिरोजषाह तुगलक के पास गयी, तो उस ब्राह्मण से कहा गया कि या तो तुम मुसलमान बनो या मृत्यु को स्वीकारो। ब्राह्मण ने मुसलमान बनना स्वीकार नहीं किया। दरबार द्वार पर लकड़ियों से चिता बनाकर, उसे जलाकर मार दिया गया।
संस्थाओं के रूप में भी धर्मान्तरण रोकने और वापसी करने का कार्य हुआ, जिसमें सबसे अग्रणी नाम आर्य समाज का है। आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानन्द ने इस पर बड़ा कार्य किया। इन्होंने शुद्धि आन्दोलन को आगे बढ़ाया। उनके आह्नान पर बहुत से मुसलमान स्वतः हिन्दू बनते गये, इससे नाराज होकर 23 दिसम्बर, 1926 को मुसलमान अब्दुल रषीद रोगग्रस्त स्वामी जी से इस्लाम पर बहस करने के बहाने आया और उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। संस्थागत रूप से घर-वापसी का कार्य श्रद्धानन्द जी के साथ रुक गया।
हर दस वर्ष में जनगणना होने लगी, हर गणना में हिन्दू घटने और मुसलमान बढ़ने की जानकारी आने लगी और चर्चा होने लगी कि देष की आबादी बढ़ रही है। चर्चा तो यह होनी चाहिए थी कि मुसलमान बढ़ रहे है; हिन्दू कम हो रहे हैं। कम होती हिन्दू जनसंख्या संघ के स्वयंसेवकों को समस्या के रूप में दिखायी देने लगी और उसका समाधान करने के लिए स्वयंसेवकों ने सन् 1995-96 से कार्य आरम्भ किया। कालान्तरण में उसका नाम धर्म जागरण किया गया।

अभय कुमार














