मई 2000 ई. का अन्तिम सप्ताह था। बिसवाँ संघ शिक्षा वर्ग में हमारी योजना (श्रद्धेय सुरेश राव केतकर जी के द्वारा ये घोषणा होते ही हमारी प्रचारक जीवन की यात्रा पूर्ण हो गई) ‘राष्ट्रधर्म’ के लिए हो गयी। मन-ही-मन राष्ट्रधर्म की लम्बी गौरवपूर्ण यात्रा को नमन करते हुए हमने यह कार्य स्वीकार किया। मन में यह भाव था कि कैसे हम सम्पूर्ण समर्पण, निष्ठा एवं गौरवपूर्ण ढंग से इस पवित्र कार्य को कर पायेंगे, जिसके विषय में हमें तब तक पूरी जानकारी नहीं थी। लेकिन जैसे ही हम लखनऊ आकर पहले दिन ‘राष्ट्रधर्म’ कार्यालय में पहुँचे, सभी कार्यकर्ताओं ने बहुत ही प्रसन्नता से स्वागत किया और सहयोग का आश्वासन भी। तत्कालीन सम्पादक श्री आनन्द मिश्र ‘अभय’, प्रभारी निदेशक श्री सुरेश चन्द्रा जी और लोकहित प्रकाशन के प्रमुख श्री आनन्दमोहन चैधरी से मिलना हुआ और पहली ही भेंट में इन तीनों वरिष्ठजनों का जो अपनत्व हमें मिला, उससे मन आनन्दित हो गया। उसके बाद अभिभावक की तरह श्री अभय जी एवं श्री चैधरी जी ने प्रकाशन के छोटे-से-छोटे काम को समझाना शुरू किया। दुर्भाग्य से कुछ समय बाद ही प्रभारी निदेशक श्री सुरेश चन्द्रा जी का संक्षिप्त बीमारी के बाद निधन हो गया और प्रभारी निदेशक बने श्री आनन्दमोहन चैधरी जी। उस समय श्री अभय जी एवं श्री चैधरी जी के साथ मिलकर एक ही लक्ष्य सामने था कि राष्ट्रधर्म को कैसे घर-घर तक पहुँचाया जाये। साथ ही इसको आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जाये तदनुरूप कई योजनाएँ बनीं और उनको लक्ष्य तक ले जाने के लिए लगातार प्रयास किये गये।
अभय जी तब बाराबंकी से आते थे। महीने के अन्त में एक दिन हमने देखा कि अभय जी अपने बस के टिकट सहेज रहे हैं। हमने पूछा क्या कर रहे हैं ? अभय जी ने कहा हम केवल ‘राष्ट्रधर्म’ से आने-जाने का ही मार्ग व्यय लेते हैं। उसी के टिकट क्रमशः लगा रहे हैं। जब वह टिकट लगाकर एक कागज पर लिख चुके तो उन्होंने वह पर्चा हमें दिया। हमने उस कागज को देखा, तो उसमें कुछ ही दिन के आने-जाने का व्यय था। हमने कहा अभय जी आप आये तो बहुत दिन हैं, फिर यह आवागमन का व्यय कम क्यों? अभय जी ने कहा- कि कुछ तारीखों के टिकट खो गये हैं, इसलिए हमने उन तारीखों को नहीं लिया। हमने बहुत आग्रह किया लेकिन वह नहीं माने। ऐसा समर्पण। और पाठकों के लिए एक काॅमा, हलन्त, पूर्ण विराम जैसी भी छोटी गलती अगर अंक में चली गयी, तो उसके लिए पाठकों से क्षमा माँगते थे। हिन्दी के प्रति पूर्ण समर्पण। राष्ट्रधर्म में वर्तनी की एक भी गलती न जाने देने के लिए वे पूरा प्रयत्न करते थे।
श्री आनन्दमोहन चैधरी जी के साथ काम करने का अपना अलग आनन्द था। गलती पर पास बैठाकर उसके बारे में पूरी तरह समझा करके उठने देते थे। जब काम का दबाव ज्यादा होता था तो कई-कई रातें हम लोग राष्ट्रधर्म में साथ-साथ रहे और नाम के अनुरूप ही बड़े-से-बड़े काम भी आनन्दपूर्वक सम्पन्न हो जाते थे। वह कभी भी किसी समस्या को बड़ी बनने से पहले ही समाप्त कर देते थे। कार्यालय के सभी कामों पर चैधरी जी की पैनी दृष्टि रहती थी।
सन् 2000 से लेकर अब तक (जिनकी चर्चा हम आगे करेंगे) विशेषांकों की लम्बी शृंखला जिसमें कुछ विशेषांकों ने तो प्रसार के रिकार्ड बनाये। पं. वचनेश त्रिपाठी स्मृति व्याख्यानमाला के अन्तर्गत तत्कालीन ज्वलन्त विषयों को लेकर और देश के महत्वपूर्ण व्यक्तियों को आमंत्रित कर एक लम्बी शृंखला चलाना, साथ ही अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता, अखिल भारतीय व्यंग्य प्रतियोगिता, श्रद्धेय भानु प्रताप शुक्ल जी की स्मृति में राष्ट्रधर्म गौरव सम्मान देश के प्रतिष्ठित स्तम्भकार को, पूज्य रज्जू भैया की स्मृति में राष्ट्रधर्म हिन्दी सेवा सम्मान जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी, लेकिन उनका काम हिन्दी के लिए था, ऐसे देश के वरिष्ठ साहित्यकार को देना, श्रीकृष्णदास माहेश्वरी राष्ट्रधर्म सम्मान इन सब कार्यक्रमों से राष्ट्रधर्म का कार्य पूरे देश में पहुँचा और यह सब सम्भव हुआ राष्ट्रधर्म एक परिवार है, इस भाव को लेकर।
इसी परिवार भाव से काम करते हुए कार्यालय में सबसे वरिष्ठ श्री पानगिरि गोस्वामी और श्री रामतीर्थ पाण्डेय जी के सान्निध्य में काम प्रारम्भ किया तो इन दोनों वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने प्रकाशन से सम्बन्धित छोटी से छोटी बातों, कार्यों को बताना-सिखाना प्रारम्भ किया। पानगिरि जी की वो प्रेम से पगी हुई डाँट आज भी याद आती है और श्री रामतीर्थ पाण्डेय जी तो समर्पण और विनम्रता की प्रतिमूर्ति। इस उम्र में भी बण्डलों को ढोकर ले जाना क्योंकि अगर कुली करेंगे, तो कार्यालय का पैसा खर्च होगा, इसलिए इस व्यय को बचाने के लिये अपने सिर पर बण्डलों को रखकर ले जाना, श्री पाण्डेय जी का यह समर्पण हम सभी कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा थी।
एक बार प्रयागराज कुम्भ में राष्ट्रधर्म और लोकहित प्रकाशन का स्टाल लगाने की योजना बनी। सभी कार्यकर्ता श्री आनन्दमोहन चैधरी जी के साथ प्रयागराज पहुँचे, पवित्र संगम तट पर दूसरे ही दिन वर्षा और भीषण शीतलहर प्रारम्भ हो गयी। जिस टेण्ट में रुके थे, वह उखड़ गया, लेकिन सभी कार्यकर्ता इस विपरीत परिस्थिति में भी मुस्कुराते हुए अपने काम में जुटे रहे। किसी ने भी कठिनाई की, न चिन्ता की और न ही चर्चा। इसी काम के आनन्द में समय धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। अब हम चर्चा करने वाले हैं अपने राष्ट्रधर्म की 75 वर्षीय गौरवपूर्ण यात्रा की जो हमने यहीं पर श्री बजरंगशरण तिवारी, श्री वीरेश्वर द्विवेदी जी, पद्मश्री वचनेश त्रिपाठी जी, आनन्द मिश्र ‘अभय’ जी, श्री राधेश्याम कपूर जी, प्रो. देवेन्द्रस्वरूप जी, प्रो. ओमप्रकाश पाण्डेय जी, श्री पानगिरि जी, श्री रामतीर्थ पाण्डेय जी, श्री नागेश्वर सहाय जी एवं नरेन्द्र प्रताप श्रीवास्तव जी, श्री विजय जुनेजा जी सहित अन्य वरिष्ठ जनों से चर्चा-वार्ता में सुनी वही राष्ट्रधर्म का वैचारिक अभियान आप सभी प्रबुद्ध जनों के सामने प्रस्तुत है-
सहलेखन का प्रतिमान आज,
उद्धोषक शाश्वत संघ-मर्म।
शाब्दिक मर्यादा मापदण्ड,
जन-जन में ‘अपना-राष्ट्रधर्म’।।
‘राष्ट्रप्रेम’ के उत्कट भाव से परिपूर्ण चेतना एवं चिन्तन का जो बीज संघ के तत्कालीन उत्तर प्रदेश प्रान्त के प्रचारक महान् चिन्तक तथा द्रष्टा श्री भाऊराव देवरस जी ने बोया एवं पं. दीन दयाल उपाध्याय जी ने पल्लवन किया, वह राष्ट्रधर्म अटल बिहारी वाजपेयी तथा श्री राजीव लोचन अग्निहोत्री जी के संयुक्त सम्पादकन मेें शैशवास्था से ही न केवल पत्रकारिता अपितु राष्ट्र निर्माण के मापदण्डों पर प्रतिपग नवीन सोपानों पर चढ़कर नवीन आयामों को खोलते हुए राष्ट्रप्रेमियों, सजग साहित्यकारों, विचारकों, आलोचकों आदि की मेधा को गुदगुदाते हुए अपनी यात्रा पर बढ़ते-बढ़ते 75 वर्ष की प्रौढ़ावस्था पर आ खड़ा हुआ है। 
प्रखर और समर्पित राष्ट्रवादी पत्रकारिता के 75 वर्ष पूर्ण होना प्रत्येक राष्ट्रवादी चिन्तक लेखक एवं साहित्यकार के लिए उत्सव का विषय तो है ही, साथ ही स्मरण करने का विषय भी है, उन सभी कलम के महान् संतों तथा धुन के पक्के मनीषियों के प्रयासों को तथा प्रत्येक सोपान की गतिविधियों को जिनमें छिपे शब्द-चिन्तन ने राष्ट्र-धर्म को वास्तविक अर्थांे में राष्ट्र का धर्म बनने में सहायता प्रदान की। ऐसे में इस यात्रा का सिंहावलोकन आवश्यक हो जाता है।
सन् 1947 से पूर्व ही संघ के चिन्तन में हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करने की योजना थी। पत्रिका को शीघ्र ही आदरणीय अटल जी जैसा प्रखर वक्ता, कवि एवं कार्यकत्र्ता मिल गया जिनकी रग-रग में राष्ट्र-प्रेम बसता था। ऐसे अटल जी ने लेखनी के धनी, प्रखर एवं तेजस्वी श्री राजीव लोचन अग्निहोत्री को भी साथ ले लिया और संयुक्त संपादकत्व में वि.सं. 2004 तद्नुसार 31 अगस्त, 1947 की श्रावणी पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के पुनीत अवसर पर राष्ट्रधर्म का प्रथम अंक प्रकाशित करते हुए संपूर्ण राष्ट्र को धर्म के प्रत्येक आयाम का दर्शन कराने की पावन सलिला प्रवाहित कर दी। यहाँ यह भी स्मरण कराना आवश्यक है कि पत्रिका का शीर्षक ”राष्ट्रधर्म“ देहरादून के स्वयंसेवक श्री विद्यासागर जी द्वारा सुझाया गया जिसे सहर्ष स्वीकार कर लिया गया। पत्रिका के प्रथम अंक के प्रथम पृष्ठ पर ही अटल जी की प्रसिद्ध कविता ’हिन्दू तन मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय’ मानो पत्रिका का खुला वैचारिक उद्घोष हो। साथ ही इसी अंक में दीनदयाल जी का चिन्तन परक लेख ’चिति’ भी छपा था जिसने लेखन की दशा और दिशा कैसी हो, का एक प्रतिमान सामने रखा। आज भी यह लेख शोधार्थियों के शोध का विषय बनता है। दीनदयाल जी के अनुसार प्रत्येक राष्ट्र की अपनी अस्मिता, अपना व्यक्तित्व एवं अपना स्वभाव होता है यही ’चिति’ है। परिवर्तन जितना इस चिति से सुसंगत होगा, उतना ग्राह्य होगा। ’चिति’ से असंगत कोई भी बात अधिक काल तक टिक नहीं सकती। इस पत्रिका की 3000 प्रतियाँ तो हाथों-हाथ ही बिक गयी। इसका दूसरा संस्करण निकालने के लिए पुनः 500 प्रतियों का आदेश दिया गया। देखते ही देखते पत्रिका का प्रसार दूसरे अंक का 4000 और तीसरे अंक का 12000 तक पहुँच गया। इस महान् कार्य को आरम्भ करने में प्रत्यक्ष नामों के अतिरिक्त कुछ अन्य नाम ऐसे भी हैं जिनका उल्लेख  किए बिना इस साहित्य-यात्रा का वर्णन अपूर्ण ही होगा। इनमें कलंत्री जी, जिन्होंने राष्ट्रधर्म के पहले कार्यालय के लिए लखनऊ में मारवाड़ी गली में अपने मन्दिर में निःशुल्क कमरा दिया। श्री राधेश्याम कपूर जी ने पहले प्रकाशक होने का दायित्व निभाया।
पत्रिका की स्थापना के अल्पकाल में ही सन् 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के आरोप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लंाछित किए जाने के बाद का समय वैचारिकता को मजबूत बनाये रखने के साथ राष्ट्रधर्म पर अपने अस्तित्व को बनाए रखने का संकट भी उत्पन्न हो गया था। प्रेस पर सरकारी ताला डालने का उपक्रम शुरु हो गया। ऐसे में दूरदर्शी योजना रखते हुए भारत सरकार को राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड की ओर से लिखा गया था कि रा.प्र.लि. एक लिमिटेड कम्पनी है। यह संस्थान रा.स्व.संघ का नहीं है। यह वह कालखण्ड था जब भगवतीचरण वर्मा जैसे प्रसिद्ध साहित्यकारों ने अपने लेखों में भी संघ के खिलाफ खूब विषवमन किया। यद्यपि वरिष्ठ प्रचारकों से मेल और संघ के कार्यक्रमों सम्मिलित होने के पश्चात् उन्हें अपने कृत्य का पछतावा भी हुआ। इसी प्रकार तमाम बाधाओं को पार करते हुए राष्ट्रधर्म की यात्रा सतत चलती रही। निश्चित ही ऐसे प्रतिबन्धों, आघातांे तथा दमनकारी नीतियों के चलते राष्ट्रधर्म अनवरत रूप से अपने साहित्य के माध्यम से समाज-परिवर्तन के कार्य में लगा रहा। श्री राजीव लोचन जी के पश्चात् 1950 में श्री महावीर प्रसाद त्रिपाठी और श्री ज्ञानेन्द्र सक्सेना ने पत्रिका के संपादन का कार्य किया। सन् 1965 में पं. रामशंकर अग्निहोत्री के संपादकत्व में फिर एक बार अपने राष्ट्रधर्म ने प्रसार के कीर्तिमान बनाये, किन्तु कुछ वर्षों में ही आप हिन्दुस्थान समाचार से जुड़कर दिल्ली चले गये और संपादक का दायित्व प्रयाग निवासी श्री सुरेन्द्र मित्तल जी के पास आया जिन्होंने कुछ समय तक इसका प्रकाशन प्रयाग से भी किया किन्तु अल्पकाल में ही राष्ट्रधर्म लखनऊ वापस आ गया और संपादन का जिम्मा सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी पं. वचनेश त्रिपाठी जी ने स्वीकार किया। वचनेश जी ने ’दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल’ को पीछे रखते हुए स्वतन्त्रता संग्राम- हुतात्मा क्रान्तिकारियों को शब्दाजंलि प्रदान की और जीवित किन्तु वृद्ध हो चुके अभावग्रस्त क्रान्तिकारियों की व्यथा समाज के सामने रखी। पं. वचनेश त्रिपाठी जी के बाद राष्ट्रधर्म के साथ वैचारिक अनुष्ठान की सहभागी लोकहित प्रकाशन का काम देख रहे भानुप्रताप शुक्ल संपादक हुए किन्तु एक वर्ष बाद ही आपात काल घोषित होने के कारण शुक्ल जी को सुरक्षा की दृष्टि से दिल्ली जाना पड़ा। इसी दौरान तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने न केवल राष्ट्रधर्म के मुद्रण केन्द्र संस्कृति भवन पर ताला जड़ दिया अपितु मशीनों, फर्नीचर को भी तोड़ दिया। रखी हुई मुद्रण सामग्री तथा कागज बन्द रहने के दौरान नष्ट हो गई। एक बार फिर से इसे संभालने के लिए वचनेश जी आगे आए किन्तु उन पर भी मीसा लगाकर गिरफ्तारी का प्रयास किया गया। किन्तु फिर भी राष्ट्रधर्म पत्रिका छपती रही यद्यपि पृष्ठों की संख्या कम हो गई। आपातकाल के बाद भी कुछ वर्षों तक वचनेश जी राष्ट्रधर्म का सम्पादन करते रहे। इसके पश्चात् वरिष्ठ साहित्यकार श्री वीरेश्वर द्विवेदी, श्री रामदत्त मिश्र तथा उनके बाद श्री आनन्द मिश्र ‘अभय’ ने संपादन का कार्य किया। अभय जी ने अठारह वर्षों का एक लम्बा समय राष्ट्रधर्म को दिया। वर्तमान में प्रोफेसर ओम प्रकाश पाण्डेय इसके सम्पादन का कार्य देख रहे हंै। 
संपादकों के साथ संचालक मण्डल का भी एक प्रभावी समूह इस वैचारिक अनुष्ठान की गति एवं दिशा को मर्यादित करता रहा। वर्ष 1949 में बैरिस्टर नरेन्द्र जीत सिंह से प्रारम्भ हुई यह परम्परा 1949 में पं. दीनदयाल उपाध्याय और श्री नाना जी देशमुख से चलते हुये 1953 में श्री विजय हरि मुंजे, श्री मनमोहन गुप्ता 1956, श्री मधुसूदन वामन मोघे, प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) वर्ष 1969, श्री भाऊराव देवरस 1970, श्री अश्विनी कुमार 1973, श्री कृष्णदास माहेश्वरी 1977, वर्ष 1984 से 1986 तक ठा. कपिलदेवलाल श्रीवास्तव, वर्ष 1986 से 2001 तक श्री सुरेशचन्द्र, श्री आनन्दमोहन चैधरी वर्ष 2001 से 2016 तक तथा वर्ष 2016 से वर्तमान तक श्री सर्वेश चन्द द्विवेदी जी के कुशल प्रभारी निर्देशन से यह वाङमय वैचारिक अनुष्ठान अनुप्राणित होता हुआ निरन्तर राष्ट्रवादियों की वैचारिक एवं साहित्यिक तृष्णा को तृप्त करता चला आ रहा है।
इस पुनीत कार्य के सम्पादक एवं निदेशक के साथ प्रबन्धकों को स्थान दिये बिना इस यात्रा वृत्तांत में कहीं न कहीं अधूरापन रह जाता। श्री बजरंगशरण तिवारी, श्री विनोद माहेश्वरी, श्री मंशाराम जी, श्री सत्येन्द्रपाल बेदी, श्री ओमप्रकाश त्रिवेदी जी ने अपने प्रबन्ध-कौशल का पूरी क्षमता से प्रयोग किया और राष्ट्रधर्म निरन्तर पाठकों के आकर्षण का केन्द्र बना रहा। वर्तमान में इन पंक्तियों का लेखक इस दायित्व का निर्वहन कर रहा है।
स्वयं को रोचक और कालानुकूल बनाये रखने के लिए राष्ट्रधर्म ने अनेकानेक प्रयास किए जिसमें विशेषांकों का प्रणयन महत्वपूर्ण रहा। विशेषांक के विषयों का चयन करते समय तत्कालीन वैचारिक-सामाजिक परिस्थिति तथा आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता है। इसीलिए वर्ष 1990 से पूर्व प्रकाशित विशेषांक भावी-भारत, युगान्तर, खालसा पन्थ, श्री रामजन्मभूमि, शहीद विशेषांक एवं सुभाष विशेषांक पाठकों द्वारा हाथों-हाथ लिये गए। इसी प्रकार वर्ष 2000 से प्रकाशित कृण्वन्तो विश्वमार्यम् के दृष्टिगत ’विश्वव्यापी हिन्दू संस्कृति’ विशेषांक पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की जयन्ती के शुभ अवसर पर श्री अशोक सिंहल जी के कर कमलों से लोकार्पित हुआ। वर्ष 2001 में भारत की सीमाओं की सुरक्षा के निधि आयाम, शिमला समझौता जैसे अनेक लेखों से युक्त सीमा सुरक्षा विशेषांक का लोकार्पण तत्कालीन गृहमंत्री भारत सरकार मा. लालकृष्ण आडवाणी द्वारा सम्पन्न हुआ। 2002 में राष्ट्ररक्षा में विदेश नीति, सैन्य व्यवस्था, वैज्ञानिक अनुसंधानों की महत्ता, आन्तरिक सुरक्षा, तिब्बत की मुक्ति, इस्लामी राजनीति आदि विषयों पर विद्वत्तापूर्ण लेख संजोये, राष्ट्ररक्षा विशेषांक का लोकार्पण श्री मदनदास जी, सह-सरकार्यवाह द्वारा किया गया। हिन्दू स्वाभिमान के जागरण, विजिगीषु हिन्दू, हिन्दू स्वभिमान के गौरव, जैसे विषयों पर स्वाभिमानी हिन्दू विशेषंाक, अल्पसंख्यकवादी राजनीति के दुष्परिणाम, विभाजन का दर्शन, कम्युनिस्टों की विभाजनकारी मानसिकता जैसे विषयों को लेकर विभाजन मिटाओ विशेषांक, इसी प्रकार हिन्दू चेतना विशेषांक, उत्तिष्ठ भारत विशेषांक, आंतरिक सुरक्षा विशेषांक, दिग्विजयी हिन्दू विशेषांक, मातृशक्ति विशेषांक, राष्ट्र साधना विशेषांक, हिमालय तिब्बत विशेषांक, जम्मू-कश्मीर एकात्मता के स्वर विशेषांक, विजय विशेषांक, हम सबके अटल जी विशेषांक, पं. दीनदयाल उपाध्याय विशेषांक, नमामि गंगे विशेषांक, सिंहावलोकन विशेषांक, महापर्व कुम्भ विशेषांक, हमारा गौरव: लद्दाख-जम्मू- कश्मीर, श्री राम-जन्मभ्ूमि तीर्थ (मंदिर) निर्माण विशेषांक तथा स्वातंत्र्य का अमृत महोत्सव विशेषांक भाग 1 एवं भाग 2। इन विशेषांकों के लोकार्पण हेतु संघ के पूज्य सरसंघचालक मा. कुप्. सी. सुदर्शन, मुरली मनोहर जोशी, श्री आदित्यनाथ योगी, संघ के तत्कालीन सरकार्यवाह श्री मोहन भागवत, ब्रिगेडियर अरुण बाजपेयी, राष्ट्र सेविका समिति की अ.भा. संचालिका वन्दनीया प्रमिला ताई मेढ़े, मेजर जनरल (से.नि.) गगनदीप बक्शी, श्री कलराज मिश्र, श्री केसरीनाथ त्रिपाठी, श्री रामनाईक, श्रीमती सुषमा स्वराज, डाॅ. सुशील चन्द्र त्रिवेदी ‘मधुपेश’ सदृश व्यक्तित्वों के मंचस्थ होते हुए सम्पन्न हुए। इन विशेषांकोें में संस्मरण के साथ-साथ गुदगुदाने के अवसर भी मिलते हैं। 
जब 2007 का अंक जनसंघ और भाजपा विशेषांक के रूप में निकाला गया तो लोकार्पण के लिए आग्रह करने हम श्रद्धेय अटल जी से मिलने दिल्ली गये, उन्होंने कहा कि अब हम तो लखनऊ चल नहीं सकते। हमने तुरन्त कहा कि अटल जी! हम तो दिल्ली आ सकते हैं। अटल जी मुस्कराये और कहा- आ जाइये, हम भी आ जायेंगे, और फिर दिनांक 7 अगस्त, 2007 को श्रद्धेय अटल जी और आदरणीय लालकृष्ण आडवाणीजी के द्वारा उन दोनों अंकों का विमोचन नयी दिल्ली में हुआ और अटल जी जैसे श्रेष्ठ वक्ता के सामने हमें कार्यक्रम का संचालन करने का सुयोग प्राप्त हुआ तथा श्रद्धेय अटल जी के द्वारा बाद में संचालन के लिए आशीर्वाद भी मिला। विधि का विधान, अगस्त, 1947 में ‘राष्ट्रधर्म’ से प्रारम्भ हुई उनकी यह सामाजिक यात्रा 7 अगस्त, 2007 को ‘राष्ट्रधर्म’ के जनसंघ और भाजपा विशेषांक के लोकार्पण के साथ ही समाप्त हुई। श्रद्धेय अटल जी का यह अन्तिम सार्वजनिक कार्यक्रम था। जिस राष्ट्रधर्म (सनातन हिन्दू धर्म) की पताका को अंगे्रजों के काल में ही पूज्य डाॅ. हेडगेवार ने उठा लिया था तथा जिसे प.पू. श्रीगुरुजी ने अपने तपोबल से दृढ़ता प्रदान की थी, अटल जी तथा दीनदयाल उपाध्याय जी ने वैचारिक ऊँचाइयाँ प्रदान कर उसे भारत के गगन में लहरा दिया। 
अटल जी का हृदय काव्यात्मक था। उनकी व्यंग्यात्मक शैली में जो रसीला पुट रहता था उसको श्रोता रातभर सुनकर भी तृप्त नहीं होते थे। वह रस अब दुर्लभ हो गया।
राष्ट्र एवं प्रेरणादायक साहित्य, गीत, कहानी, बालोपयोगी साहित्य, क्रांतिकारियों एवं महापुरुषों की जीवनियाँ, चर्चित विषयों पर पुस्तकें, समसामाजिक सरोकारों तथा जीवनोपयोगी विषयों पर पुस्तकों के प्रकाशन के माध्यम से लोकहित प्रकाशन (राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड का एक भाग) भी समानान्तर समाज एवं साहित्य की सेवा कर रहा है।
लोकहित प्रकाशन से अब तक कुल 352 पुस्तकें प्रकाशित की जा चुकी हैं और अधिकतम पुस्तकों ने प्रसार के कीर्तिमान बनाये, जिनमें प्रमुख रूप से डाॅ. हेडगेवार चरित, धर्म और संस्कृति, हमारी सांस्कृति विचारधारा के मूलस्रोत, भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम पृष्ठ, संघ नींव में विसर्जित, डाॅ. आम्बेडकर एवं सामाजिक जीवन की यात्रा, डाॅ. आम्बेडकर और जोगेन्द्रनाथ मंडल, राष्ट्र वंदना, राष्ट्र जीवन की दिशा, राष्ट्र-चिन्तन, भारतीय अर्थनीति, सम्राट चन्द्रगुप्त, जगद्गुरु शंकराचार्य और विश्वव्यापी हिन्दू संस्कृति प्रमुख हैं। लोकहित प्रकाशन को गरिमामय बनाने में कुछ प्रमुख  मनीषियों का स्मरण करना आवश्यक है। जिनमें श्री भानुप्रताप शुक्ल, श्री ओङ्कार जी भावे, श्री प्रकाश जी अवस्थी, श्री अनन्तरामचन्द्र गोखले आदि ने प्रकाशन के प्रमुख की जिम्मेदारी का निर्वाहन किया।
इसी प्रकार विचार धारा के प्रचार-प्रसार के लिए पं. वचनेश त्रिपाठी स्मृति व्याख्यान माला एवं भानुप्रताप शुक्ल स्मृति राष्ट्रधर्म सम्मान की शृंखला वर्ष 2007 से विश्व युवक केन्द्र चाणक्यपुरी नई दिल्ली से प्रारम्भ की गई। प्रथम आयोजन के मंचस्थ व्यक्तित्व साध्वी ऋतंभरा जी, श्री कुप्.सी. सुदर्शन जी तत्कालीन परमपूज्य सरसंघचालक तथा डाॅ. मुरली मनोहर जोशी जी रहे और इस अवसर पर युग धर्म और तरुण भारत मराठी संस्करण के भू.पू. संपादक श्री सत्यपाल कृष्ण राव पटाईत तथा हरिकृष्ण निगम स्तम्भ लेखकों का सम्मान किया गया। इसी वर्ष लखनऊ के सहकारिता भवन में प्रोफेसर देवेन्द्र स्वरूप का सम्मान किया गया। वर्ष 2008 माधव सभागार निराला नगर लखनऊ में मंचस्थ श्री राजनाथ सिंह ‘सूर्य’ लखनऊ, तत्कालीन महापौर डा. दिनेश शर्मा, श्री प्रकाश बैताला एवं डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री ने श्री नरेन्द्र देव शास्त्री तेजपुर असम को असमिया तथा नई दिल्ली के श्री शंकर शरण को हिन्दी स्तम्भ लेखन के लिए सम्मानित किया। यह यात्रा 2009, 2010, 2011, 2012 तथा 2013 क्रमशः भुवनेश्वर के विपन्न सहायता समिति भवन, छोटी खाटू राजस्थान के तेरापन्थ भवन, माधव सभागार लखनऊ, भुवनेश्वर में श्री दत्ताजी होसवाले तत्कालीन सह सरकार्यवाह श्री जुगुल किशोर जयथालिया, पूज्य श्री सुदर्शन जी, श्री पुरुषोत्तम लाल चतुर्वेदी जी, श्री हस्तीमल जी, श्री अरुण जेटली जी, भईयाजी जोशी (तत्कालीन माननीय सरकार्यवाह) एवं श्री अमितशाह जी तथा श्रीधर पराडकर जी जैसे व्यक्तियों ने राष्ट्रधर्म के मंच पर आकर गरिमा प्रदान की और इसके साथ ही देश के वरिष्ठ साहित्यकारों ने राष्ट्रधर्म के द्वारा दिया जाने वाला सम्मान स्वीकार कर राष्ट्रधर्म को आनन्द का अवसर दिया। उड़िया के लिए श्री अरुण कुमार पण्डा, श्री हृदयनारायण दीक्षित (हिन्दी), डाॅ. शिवओम अम्बर, शिवकुमार गोयल, के. विक्रमराव तथा श्री मनमोहन शर्मा, जैसे स्तम्भ लेखकों को सम्मानित कर राष्ट्रधर्म ने देश के विभिन्न प्रान्तों तक अपनी पहुँच बनायी। समय-समय पर ऐसे आयोजन राष्ट्रधर्म की लोकप्रियता को बढ़ाते चले गए। एक राष्ट्रीय पत्र होने के कारण राष्ट्रधर्म का सदैव प्रयास रहा कि लेखों में भी विविधता रहे तथा सभी प्रान्तों के साथ विदेशों में रह रहे हिन्दी लेखकों की कहानियों, कविताओं, लेखों, व्यंग्यों आदि का रसास्वादन पाठकों को कराते रहे जिससे वसुधैव कुटुम्बकम की भावना बनी रहे।
वर्तमान में हम सब राष्ट्रधर्म के सुधी पाठकों और हितचिन्तकों के लिए आनन्द की बात है कि राष्ट्रधर्म के निदेशक श्री मनोज कान्त जी और सम्पादक मण्डल के प्रयत्नों से सौ से ज्यादा नये लेखक अपने विचार से जुड़े, साथ ही राष्ट्रधर्म के व्याप को बढ़ाने के लिए नित-नवीन प्रयोग भी हो रहे हैं।
कई झंझावातों तथा संकटकालों से राष्ट्रधर्म गुजरता रहा। जबकि सर्वोत्तम (रीडर्स डाईजेस्ट) नवनीत, कादम्बिनी, धर्मयुग तथा माया जैसी उस समय की अति साधन सम्पन्न पत्रिकाएँ बन्द हो गयीं। किन्तु सतत आर्थिक कठिनाइयों से ग्रस्त होने पर भी वैचारिक पत्र होने के साथ साहित्यिक पत्र रहकर भी वरिष्ठ एवं समर्पित कार्यकर्ताओं के अनथक प्रयास ने जिस प्रकार से अपने वैचारिक लेखों सांस्कृतिक ज्ञान सनातन चिंतन परम्परा को अनुप्राणित करता हुआ, हिन्दुत्व के भावबोध और राष्ट्रीयता को सर्वोत्कृष्ट मानते हुए सम्पूर्ण विश्व मानवता के कल्याण हेतु वसुधैव कुटुम्बकम् एवं सामाजिक समरसता के मानबिन्दु का वाङ्मय समक्ष रखा, उसकी सुग्राह्यता के चलते न केवल वैचारिक चिन्तकों, स्तम्भ लेखकों अपितु गद्य-पद्य की समस्त विधाओं के पाठन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए सहज उपलब्ध वैचारिक पत्र के साथ-साथ ही पारिवारिक पत्र के रूप में हीरक जयन्ती वर्ष मनाने के साथ ही अपने राष्ट्रधर्म की गौरवपूर्ण यात्रा अनवरत गत्वर है- 
डटे हुए हैं राष्ट्रधर्म पर, विपदाओं में सीना ताने।

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