
यह मात्र संयोग ही नहीं है कि ‘राष्ट्रधर्म’ की जीवन-यात्रा भारत की स्वतन्त्रता के समानान्तर ही 15 अगस्त, 1947 को प्रारम्भ हुई। इसकी पृष्ठभूमि में, निश्चित ही कुछ अदृश्य दैवी-योजना भी निहित रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उस समय तक 22 वर्ष की अवस्था को पारकर 23वें वर्ष में प्रवेश कर चुका था। सम्पूर्ण देश में संघ की रीति-नीति का प्रसार तेजी से हो रहा था। समाज में उसके प्रति सद्भावना भी बढ़ती जा रही थी, लेकिन कुछ ऐसे विघ्न-संतोषी भी थे, जिनके मन में तब भी भ्रम कुलबुला रहे थे। इनके अपनयन के लिए आवश्यकता थी पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम की, जिसमें संघ, समाज और राष्ट्र के सन्दर्भ में गम्भीर वैचारिक विमर्श उत्पन्न हो सके।
‘राष्ट्रधर्म’ के आरम्भ-काल में, उत्तर प्रदेश में जो पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही थीं, वे मूलतः साहित्यिक प्रकृति की थीं। इनमें सरस्वती, सुधा, माधुरी, हंस, चाँद इत्यादि प्रमुख थीं, जिनमें कथा-कहानी, कविताएँ और साहित्य-समीक्षाएँ ही अधिक रहती थीं। गम्भीर राष्ट्रीय और सामाजिक विमर्श की सामग्री इनमें यदा-कदा ही दिखलायी देती थी। इसी अभाव की पूर्ति के लिए संघ के विशिष्ट विचारकों और प्रचारकों को ‘राष्ट्रधर्म’ जैसी पत्रिका की आवश्यकता प्रतीत हुई। उस समय उत्तर प्रदेश के प्रमुख प्रचारक शिरोमणि थे, मा. स्व. भाऊराव देवरस, जो 1935 में ही अध्ययन के ब्याज से उ.प्र. को अपना कार्यक्षेत्र बना चुके थे। उनका मुख्य केन्द्र भी लखनऊ ही था। उनके सहयोगी थे पं. दीनदयाल उपाध्याय, जो क्षेत्रीय संगठन-कार्य में व्यस्त रहते हुए भी गम्भीर चिन्तन और उसके लेखन-प्रकाशन की आवश्यकता गहराई से अनुभव कर रहे थे।
अन्ततः ‘राष्ट्रधर्म’ के प्रकाशन की योजना बनी। उसके समुचित क्रियान्वयन के लिए लखनऊ के सदर क्षेत्र में एक पुराना बँगला भी खोज लिया गया। संपादन के लिए कानपुर के डी.ए.वी. कालेज में कानून की पढ़ाई कर रहे, पूर्व प्रधानमंत्री मा. अटल बिहारी वाजपेयी तथा बलिया जिले के संघ-प्रचारक श्री राजीव लोचन अग्निहोत्री जी बुलाये गये। वित्त-व्यवस्थापक के रूप में दादाजी (श्री जगदम्बा प्रसाद श्रीवास्तव) जुड़ गये।
अनेक कठिनाइयों के बावजूद ‘राष्ट्रधर्म’ का प्रथम अंक 15 अगस्त, 1947 (स्वतन्त्रता-प्राप्ति के दिन) के उपलक्ष्य में प्रकाशित हो ही गया। संपादक के रूप में नाम तो छपे श्री अटल जी और श्री राजीव लोचन जी के, लेकिन उस अंक के सम्पादकीय (अग्रलेख) का लेखन किया था पं. दीनदयाल उपाध्याय जी ने। मुखपृष्ठ पर स्व. अटलजी की प्रख्यात कविता ‘हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन…’ छपी। उस प्रथम अंक से ही बौद्धिक जगत् में ‘राष्ट्रधर्म’ ने अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाना प्रारम्भ कर दिया था। उसके गुरु-गम्भीर वैचारिक पक्ष के कारण शीघ्र ही स्व. भैया साहब (‘सरस्वती’ संपादक पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी), डाॅ. मुंशीराम शर्मा ‘सोम’, डाॅ. वासुदेवशरण अग्रवाल सदृश श्रेष्ठ मनीषी और लेखक निरन्तर जुड़ते चले गये।
1967 में पूर्णकालिक (प्रधान) संपादक बने वचनेश त्रिपाठी जी भी ‘राष्ट्रधर्म’ से वस्तुतः तभी जुड़ गये थे। वे अटल जी से पहले से ही सुपरिचित थे, जब अटल जी सण्डीला में कुछ समय विस्तारक/प्रचारक के रूप में कार्यरत रहे थे।
कहते हैं, सुख के दिन अधिक समय तक नहीं रहते हैं; ‘राष्ट्रधर्म’ भी इस कहावत की चपेट में, अपने जन्म के कुछ काल बाद ही आ गया। महात्मा गान्धी की हत्या जैसे ही एक सिरफिरे व्यक्ति ने कर दी, तत्कालीन कांग्रेस पार्टी की सरकार को संघ पर अपना चिर-संचित आक्रोश व्यक्त करने का अलभ्य अवसर मिल गया। उस घटना की आड़ में उसने संघ पर प्रतिबन्ध ही लगा दिया। ‘राष्ट्रधर्म’ का प्रकाशन भी स्थगित हो गया। संघ के सैकड़ों वरिष्ठ अधिकारी, प्रचारक और कार्यकर्ता बन्दी बना लिये गये। फर्रुखाबाद के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता स्व. श्री महावीर प्रसाद त्रिपाठी (दद्दा जी) ‘राष्ट्रधर्म’ के नये संपादक नियुक्त हुए, लेकिन परिस्थितियाँ इतनी प्रतिकूल थीं कि उनके संपादन में उसका कोई अन्य अंक नहीं निकल सका।
‘राष्ट्रधर्म’ के प्रकाशन-काल में ही दैनिक ‘स्वदेश’ भी अटल जी के संपादन और दीनदयाल उपाध्याय जी के पर्यवेक्षण में प्रकाशित होता रहा। प्रतिबन्ध हटने के बाद भी ऐसी स्थितियाँ नहीं बन सकीं कि ‘राष्ट्रधर्म’ का तत्काल ही पुनः प्रकाशन हो सकता। इसी मध्य ‘पांचजन्य’ प्रारम्भ हुआ। अटल जी ‘वीर अर्जुन’ के संपादक होकर दिल्ली चले गये। भारतीय जनसंघ की स्थापना होते ही अटल जी, दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख जैसे यशस्वी एवं वरिष्ठ प्रचारक उसके विकास में संलग्न हो गये।
अतः ‘राष्ट्रधर्म’ के पुनः प्रकाशित होने की वेला आयी 1965-66 में। संघ के वरिष्ठ प्रचारक स्व. पं. रामशंकर अग्निहोत्री उसके नये संपादक बने। अग्निहोत्री जी प्रचारक होने के साथ ही बहुत अच्छे कवि, लेखक और पत्रकार भी थे। उनके कुशल सम्पादन में ‘राष्ट्रधर्म’ नये रंग-रूप और गम्भीर सामग्री से सम्पन्न होकर निकला। बहुत अच्छे लेखक भी उससे जुड़े, लेकिन ‘राष्ट्रधर्म’ की जन्म-पत्रिका में, शायद पुनः किसी क्रूर ग्रह की छाया उभार ले रही थी। अग्निहोत्री जी भी ‘युगवार्ता’ और ‘हिन्दुस्थान समाचार’ के संपादक होकर दिल्ली चले गये। ‘राष्ट्रधर्म’ के प्रयाग से प्रकाशन की नयी योजना बनी। संपादक नियुक्त हुए डाॅ. सुरेन्द्र मीतल जी। लेकिन अधिक समय तक तीर्थराज में वास करना शायद ‘राष्ट्रधर्म’ के प्रारब्ध में नहीं था। 1967 में किसी समय ‘राष्ट्रधर्म’ पुनः लखनऊ लौट आया। इस बार संपादन का पुनः पूर्ण दायित्व दिया गया पं. श्री वचनेश त्रिपाठी जी को, जो इससे पूर्व ही ‘पांचजन्य’ और ‘तरुण भारत’ के यशस्वी संपादक के रूप में सुकीर्ति अर्जित कर चुके थे।
वचनेश जी की कलम में जादू था। उनकी लच्छेदार भाषा पाठकों को बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लेती थी। स्वतन्त्र लेखक के रूप में अपनी रोचक कहानियों और छोटे-छोटे उपन्यासों के लेखन से वे तब तक साहित्यिक क्षेत्र में अच्छी-खासी प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके थे। अनेक क्रान्तिकारियों से सम्बद्ध संस्मरणों के लेखन में उन्हें गहरी महारत हासिल थी। अनेक क्रान्तिकारियों से उनका निकट परिचय भी था। उनसे पूर्व बनारसीदास चतुर्वेदी भी क्रान्तिकारियों के साहित्यिक श्राद्ध में संलग्न थे, लेकिन वचनेश जी की लेखनी उनसे भी आगे बाजी मारने लगी थी। कितने ही यशस्वी लेकिन अभावग्रस्त क्रान्तिकारी उन दिनों ‘राष्ट्रधर्म’ कार्यालय में आते रहते थे। उनकी यथाशक्ति सहायता भी पारिश्रमिक के रूप में होती रहती थी। उनके संस्मरणों के प्रकाशन से ‘राष्ट्रधर्म’ की लोकप्रियता शिखर को छूने लगी। पाठक-संख्या तेजी से बढ़ने लगी।
उन्हीं दिनों बाराबंकी में आयोजित एक आई.टी.सी. (प्राथमिक शिक्षा वर्ग) में मेरा उनसे परिचय हुआ। दो-चार वाक्यों में ही उन्होंने मुझे ‘राष्ट्रधर्म’ के संपादन-कार्य में अपने साथ सहयोगी के रूप में जुड़ने के लिए तैयार कर लिया। ‘राष्ट्रधर्म’ का सम्भवतः वह अत्यन्त समृद्धकाल था, जब परिमाण और गुणवत्ता दोनों ही दृष्टियों से ‘राष्ट्रधर्म’ की प्रतिष्ठा बेहद उभार पर थी। वचनेश जी अपने सहयोगियों से सद्भावपूर्ण ढंग से काम करा लेने में कुशल थे और लेखक के रूप में वे मुझे निरन्तर उकसाते रहते थे।
वचनेश जी के अवकाश प्राप्त कर लेने के बाद स्व. श्री भानुप्रताप शुक्ल जी ‘राष्ट्रधर्म’ के संपादक बने। वे भी अच्छे कहानीकार और लेखक थे। आपातकाल के प्रारम्भ होते ही, गिरफ्तारी से बचने के लिए वे दिल्ली चले गये, बाद में ‘पांचजन्य’ के दीर्घकाल तक संपादक रहे। कुछ समय अन्य पत्र-पत्रिकाओं में उन्होंने स्वतन्त्र लेखन भी किया। उनके बाद मा. श्री वीरेश्वर द्विवेदी जी संपादक नियुक्त हुए। वे स्वयं भी बहुत अच्छे लेखक एवं कवि थे। उनका कार्यकाल भी बहुत अच्छा रहा। ‘राष्ट्रधर्म’ के माध्यम से अनेक नयी प्रतिभाओं को उभरने का अवसर उनके समय में मिला। श्री द्विवेदी जी के बाद श्री रामदत्त मिश्र जी ने ‘राष्ट्रधर्म’ के संपादन का दायित्व सँभाला। वे दैनिक ‘अमर उजाला’ से आये थे, इस कारण पाठकों की नब्ज वे अच्छी तरह पहचानते थे।
‘राष्ट्रधर्म’ के संपादन की दृष्टि से सर्वाधिक लम्बा कार्यकाल (सितम्बर, 1997 से अगस्त, 2016 तक) रहा श्री आनन्द मिश्र ‘अभय’ जी का। ‘राष्ट्रधर्म’ में सर्वांगीण दृष्टि से उपयोगी और नयी-नयी रोचक सामग्री के प्रकाशन की ओर उनकी सजगता उल्लेखनीय रही। उनके संपादकीय भी जनमानस का ध्यान आकृष्ट करने में बेहद समर्थ थे। अरुचिकर एवं बोझिल सामग्री से वे सप्रयत्न बचते थे, लेकिन रुचिकर सामग्री को आगे बढ़ाने में पीछे भी नहीं रहते थे।
मूलतः ‘अभय’ जी राजस्व-सेवा (प्रशासनिक) से निवृत्त होकर आये थे, लेकिन शीघ्र ही उन्होंने ‘राष्ट्रधर्म’ की प्रकृति के अनुरूप ही सामग्री के चयन को अपनी प्राथमिकता में सम्मिलित कर लिया।
प्रशासनिक या अन्य क्षेत्र में प्रतिष्ठित व्यक्तियों की पद-प्रतिष्ठा का सम्मान करते हुए भी वे उनके अरुचिकर, बोझिल और नीरस लेखों को विनम्रता से लौटा देते थे। भारी-भरकम सन्दर्भ ग्रन्थों का हवाला देकर लिखे गये नये प्राध्यापकों के शोध लेखों की अपेक्षा, वे वे ही लेख छापते थे, जिसे परिवार और समाज के सामान्य व्यक्ति भी पढ़कर आनन्द-लाभ कर सकें। एक बार मैंने उन्हें वैदिक रुद्राभिषेक से सम्बद्ध एक शोधपूर्ण गम्भीर लेख दिया, जिसे उन्होंने यह कहकर मुझे वापस कर दिया कि ‘राष्ट्रधर्म’ के पाठक के लिए यह बहुत बोझिल रहेगा। लेकिन जब मैं उन्हें पेरिस-प्रवास काल से सम्बद्ध रुचिकर सामग्री पेरिस से ही भेजता रहा, तो उसे उन्होंने बड़ी रुचि से प्रकाशित किया। ‘सरस्वती’ के यशस्वी सम्पादक- प्रवर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की इस आदर्श मान्यता का अनुकरण ही किसी सफल संपादक की कसौटी है कि ‘बिना किसी दबाव, लगाव, सम्बन्धों के निर्वाह या प्रलोभन में पड़े पत्रिका में वही सामग्री दी जानी चाहिए, जो पाठकों के लिए उपादेय हो, परिवार का प्रत्येक सदस्य जिसे निःसंकोच पढ़ सके और जो मानवीय मूल्यों को पहचानने में सहायक सिद्ध हो। सामग्री के चयन में संपादक को लेखक का चेहरा सामने न रखकर पाठक का चेहरा सामने रखना चाहिए।’
इस दृष्टिकोण से वे सफल संपादक थे, जिनके कार्यकाल में बादल जी के सहयोग से कहानी और व्यंग्य-लेखन की प्रतियोगिताएँ भी सफलतापूर्वक आयोजित होती रहीं, जिनमें लखनऊ नगर के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार और सामाजिक- राजनीतिक कार्यकर्ता भी रुचिपूर्वक सम्मिलित होते रहे। 85 वर्ष की अवस्था तक ‘राष्ट्रधर्म’ का संपादन करने के बाद उन्होंने सितम्बर, 2016 के अंक से संपादन का दायित्व प्रेम से मुझे सौंप कर मेरा उत्साह-संवर्धन करते हुए अवकाश ले लिया। मेरा प्रयत्न भी यही रहा है कि अपने यशस्वी पूर्व-संपादकों के द्वारा प्रदर्शित संपादन-सरणि पर चलते हुए ‘राष्ट्रधर्म’ के पाठकों तक उपादेय राष्ट्रीय विमर्श को पहुँचाने में सहायक सिद्ध हो सकूँ-
‘मुनिन्ह प्रथम जेहि कीरति गाई।
तेहि मग चलत सुगम मोहि भाई।।’













