
राम-रावण या कुबेर अलग-अलग मानव जातियों के नहीं थे। हाँ, इन लोगों ने अलग-अलग जातियों पर राज करना आरम्भ कर दिया था। राम यदि सूर्यवंश के आर्य थे, तो रावण पुलस्ति वंशी आर्य था।
मनु के वंशज मानव कहलाते थे और पुराने समय में मनु के वंशजों का काबुल अर्थात् बेबीलोन से लेकर भारत देश तक फैलाव फैला हुआ था। यह लोग उत्तर कुरु के देव कहे जाने वाले आर्यों को अपना मित्र मानते थे। मध्य एशिया का सम्राट् देवकुल का इन्द्र उर्फ इन-दर या इन-दुर अथवा इन-थोर भारत से लेकर मध्य एशिया तक अनेक आर्य जातियों में समान रूप से पूजित था। यह एक तरह से पुराने आर्यों का मुखिया था, ऐसे इन्द्र तक को रावण दशग्रीव के बेटे मेघनाद ने हराया था।
राजा रामचन्द्र के पुरखे राजा अनरण्य भी एक रावण के हाथों ही मारे गये थे। तमिल भाषा में राजा को ‘इरवण’ कहते हैं। आर्य जाति के होते हुए भी देव, दैत्य, दानव, असुर, नाग, गन्धर्व और दानव एक बड़े कबीले में बैठकर दूर-दूर चले जाने और दूसरी जातियों की संस्कृतियों से घुल-मिल जाने पर एक दूसरे के लिए एकदम से पराये पड़ गये थे। रावण, वसिष्ठ, भृगु, अत्रि आदि वंशों के ब्राह्मण अग्निवंशी कहलाते थे और इनका वंश ब्राह्मण वंश कहलाता था। ब्राह्मणों ने बढ़ने और फैलने के सिद्धान्त में विश्वास किया, परन्तु मध्य एशिया के क्षत्रिय इतने गुस्सैल थे कि क्रोध आने पर जरा-सी बात में वे आपस में एक-दूसरे की मार-काट मचा देते थे। इन ब्राह्मणक्षत्रियों के झगड़े उन दिनों में ईराक से लेकर हमारे देश के उत्तरी भाग तक काफी फैल चुके थे।
मैंने ऊपर बताया कि रावण ने राम के पुराने (पूर्वज) अनरण्य को मारा था। अनरण्य के बाद, सगर के पिता राजा बाहुक के समय में भृगुवंशी ब्राह्मण ने राजाओं का नाश किया। फिर अश्मक राजा के समय में भी ऐसा ही सर्वनाश हुआ। इसलिए इक्ष्वाकु वंशी मध्य एशिया से भाग कर फिर उसी अयोध्या में आ बसे जिसे राजा नाभि ऋषभ, भरत आदि ने कभी अपनी राजधानी बनाया था। धीरे-धीरे कुछ पीढ़ियों में उन्होंने ऐसा शक्तिशाली संगठन कर लिया था कि उसके बाद रावण अयोध्या के इक्ष्वाकुवंशियों को जीत न पाया।
इस वंश के राजा रघु ने बड़ा नाम किया। उसके समय में यह हेति या हिट्टी लोग सिंध, पंजाब तक उतर आये थे। यह राजा रघु का ही प्रताप था कि उनके डर से खैबर दर्रे वाला रास्ता हिट्टियों के लिए बन्द हो गया। महाराजा रघु ने अफगानिस्तान, ईरान आदि जीत लिया। वहाँ की ईसिन अथवा ईशिन नामक राजधानी पर उसका अधिकार हुआ। सम्भवतः हिट्टी इसी घटना के बाद ही समुद्र के रास्ते लंका पहुँच गये और लंका को अपना अड्डा बनाकर उन्होंने दक्षिण भारत के काफी भाग में अपना आधिपत्य जमा लिया। तब तक हेति या हिट्टी कुल वाले एकदम वीर विहीन नहीं हो गये थे। इनके इस घराने में माली, सुमाली और माल्यवान नामक तीन भाई बड़े प्रतापी हुए। उन्होंने अफ्रीका, मिस्र आदि पर अपना अधिकार कर लिया। राम के परम शत्रु दशग्रीव नामक रावण के नाना सुमाली के नाम पर अब तक सोमालीलैण्ड चला आया था।
इसी सोमाली की बेटी ईरान के पुलस्ति ऋषि के वंश में विश्रवा को ब्याही गयी थी। विश्रवा का एक बेटा कुबेर भी था। कुबेर ने लंका पर अधिकार कर लिया था। फारस की खाड़ी के बाद लंका के आस-पास हिन्दसागर में ही अच्छे और मूल्यवान मोती पाये जाते थे, इसलिए कुबेर कुछ ही दिनों में बहुत मालदार हो गये थे। राजा रघु के आक्रमण के बाद ईरान का पुलस्तिवंशी दशग्रीव रावण अपने देश से करीब-करीब उजड़ गया था। अपने मामाओं की सहायता से रावण ने अपने बड़े भाई से लंका छीन ली और वहाँ जम गया। उसने दक्षिण भारत का बहुत सा भाग जो उसके अधिकार में था, उस पर खर-दूषण तथा सूर्पणखा के पति आदि को सूबेदार बनाकर भेज दिया।
राम और रावण की लड़ाई होने का असली कारण यह था कि रावण उस क्षत्रिय वंश को मुसीबत में फँसा देखकर उजाड़ देना चाहता था, जिसके कारण उसे ईरान, सिन्ध आदि स्थानों से हटना पड़ा; उन दिनों रावण का बेटा मेघनाद इन्द्र को हराने के लिए मध्य एशिया पर चढ़ाई करने गया हुआ था। इससे पहले जब द्वन्द पर इन्हीं हिट्टी असुरों का आक्रमण हुआ था, तो अयोध्या से लेकर ईशिन तक के राजा दशरथ ने इन्द्र की सहायता की थी।
मेघनाद उसी इन्द्र को हराकर उसे बाँध लाया था। सुमेरु अर्थात् आज के अल्ताई पहाड़ तथा मिस्र देश के स्वर्ण भण्डारों पर रावण का अधिकार हो गया था। अरबों रुपयों की लूट के वैभव से छोटा सा लंका टापू सचमुच सोने का भण्डार बन गया था।
वानर से आमतौर पर लोग यह समझ लेते हैं कि वे सब बन्दर थे। यह बात सच नहीं है। वानर के माने पुरुष के होते हैं, और एक संजोग की बात यह है कि राम और वानर हनुमान दोनों ही मूलमरुत गण के थे। लांगूल का एक अर्थ पूँछ के अलावा हल भी होता है, इसलिए यह सिद्ध हो जाता है कि इन लांगूलधारी वानरोंा से ही खेती आरम्भ हुई थी। विद्याधर वानर हनुमान इसीलिए आज तक किसानों के परम इष्टदेव हैं।
लंका में हेतियों से मोर्चा लेना बड़ा ही कठिन काम था। हेति लोग माया युद्ध करने में बड़े ही प्रवीण थे। इनके सिपाही मुखौटे लगा-लगाकर लड़ते थे और उन मुखौटों को वे जल्दी से बदलकर अपना रूप कुछ से कुछ बना लिया करते थे। इसके अलावा इनकी लड़ाई में एक खास बात यह थी कि यह लोग बहुत बड़ी संख्या में अचानक शत्रुओं पर छापा मारते थे। छापा मारने के लिए कौन-कौन सी युक्ति किस समय की जाये, इस बात का ध्यान रखा जाता था। शत्रु की किन शक्तियों से बचना चाहिए, उन शक्तियों को कैसे बिखेरना चाहिए, हवा की तरह अदृश्य बनकर शत्रु की राजधानी में कैसे घुसें और कैसे उस पर कब्जा करें, इन तमाम बातों का ध्यान रखना ही माया युद्ध की विशेषता थी।
हेति लोग असल में रथों की लड़ाई लड़ने में उस्ताद थे। उनके रथ बहुत ही उम्दा बने हुए होते थे। जैसे आजकल लड़ाइयों में टैंक चलते हैं, उसी प्रकार हेतियों के रथ भी कोठरीनुमा बन्द होते थे। उनमें बाण लगाने के झरोखे बने रहते थे। इन रथों में बैठकर शत्रु पर बाण वर्षा करने वाले वीर दूसरों के तीरों की मार से बचा रहता था। इन रथों से वे पैदल लड़वैयों को घेरकर कुचल देते थे।
रामचन्द्र ने रावण की यह रणनीति पहचान ली। उन्होंने शक्ति को युक्ति से जीत लिया। उन्होंने यह देखा कि बड़े-बड़े मैदानों में रथों का कुशल संचालन से जीतने वाले यह प्रतापी हेति लोग लंका टापू में सकरी जगह होने के कारण अपने रथों का वैसा फैलाव नहीं कर पाते जैसा कि आमतौर पर उनकी नीति के अनुसार हुआ करता था। राम ने अपने शत्रुओं की यही सीमा पहचान कर, अपने वानरों को इस तरह से लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया कि वे उनके रथों को अलग-अलग घेरकर उन्हें नष्ट कर देते थे। इस प्रकार रथ के रड़वैये अपने-अपने रथों का नाश होने पर पैदल उतर कर लड़ने के लिए मजबूर होते थे और यही पैदली लड़ाइयाँ हेतियों को मात पर मात देती चली गयीं। दशग्रीव राण और उसकी प्रतापी परिवार राम की सूझबूझ और उनकी रणनीति के कुशल संचालन से मारा गया। श्रीराम से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व से जिन हेतियों ने पृथ्वी पर अपना दबदबा जमा रखा था। वे इसके बाद क्रमशः इतिहास से लोप हो गये। श्रीराम ने दक्षिण और उत्तर दोनों दिशाओं से हेतियों को समाप्त कर दिया। यही नहीं, ईरान में भी उन्होंने नयी गति की। पहले न जीते हुए क्षेत्रों को जीता और साथ ही साथ ईराक में स्थित राजा सगर अर्थात् सार्गोन महान की अयोध्या भी अपने अधिकार में कर ली, हुफरात की ‘अजुतु’ से सरयू स्थित अयोध्या तक और लंका से कश्मीर तक प्रतापी सम्राट रामचन्द्र ने प्रजा को अत्याचारी दुष्टों के निर्मम पंजे से छुड़ाकर उसे हर प्रकार से संतुष्ट करने के ऐसे उत्तम उपाय किये कि उसका रामराज आज तक बखाना जाता है।
हुफरात तट के सूर्य मन्दिर में मिलने वाली, वंशावलियों में श्रीराम का नाम आने का यही कारण है। राम-रावण का युद्ध इस रूप से इतिहास का एक बीता हुआ पृष्ठ ही है। राम-कथा में आध्यात्मिकता अथवा भक्ति के चाहे कितने ही सुन्दर तत्त्व मिलकर उसे एक नया और गहरा अर्थ दे गये हों, पर राम-रावण युद्ध वस्तुतः एक ऐतिहासिक युद्ध है जो ईसा से लगभग पन्द्रह-सोलह सौ वर्ष पूर्व हुआ था।
(राष्ट्रधर्म- दिसम्बर, 1972)













