
‘जागो उठो, दुर्बार भांगो कोरो चूरमार,
लात मारो जालिमेर तख्ते।’
जागो उठो ! लात मार कर चूर-चूर कर डालो जालिम का तख्त क्योंकि वह अन्यायी सिंहासन है। उसका विनाश शुभ होगा, कल्याणकर होगा। यह पुकार मुक्ति-सैनिक की है, बंगला देश के संघर्षरत मन-प्राणों की यही पुकार है- यही दो टूक आह्वान। इस आह्वान की बंग-बंधुओं ने बहुत कीमत चुकाई है। उस कीमत को कौन आँकेगा ?
आह ! कोतो जे मुखर
मुख मूक होये गैलो
पीच ढाला कोतो पोथ
रांगा होये गैलो
शोना भरा कोतो फूल
झोरे पोड़े गैलो
-हाय, कितने मुखरित मुँह मौन हो गये, सदा के लिए। अब वे कभी नहीं बोलेंगे। उनकी आवाज कभी सुनायी न देगी। उनके रक्त से कोलतार पुते काले रास्ते, हाय रक्तिम हो गये और कितने ही प्राण-प्रसून खिले, अधखिले, कितने ही ताजे फूल टूट गिरे और बिखर गये। उन बलिदानी प्राण-पुष्पों के लिए हमने क्या किया ? कुछ भी तो नहीं। और उधर पद्मा-पार से पुकार अनवरत आये जा रही है-
आयोष ना प्रतिशोध
प्रतिशोध प्रतिशोध
रक्तेर प्रतिशोध रक्ते
संधि नहीं प्रतिशोध। प्रतिशोध ! प्रतिशोध ! खून का बदला खून ! संग्राम चोलबे चोलबे। युद्ध हमारा चलता रहेगा।
विप्लव ! विप्लव !
महाकाल पाक खाये घुरछे इतिहास जीवनेर
रोक्तेरांगा विप्लव फोलबे।
-महाकाल घूर्णायमान है। रक्त-रंजित विप्लव फैलेगा।
किसी ने बंगला देश में इन विप्लव-पंथियों से पूछा- ”यह किसलिए ? यह रक्तदान किस प्रयोजन से ?“
विप्लव-पथी अर्थात् मुक्ति-सैनिक ने उत्तर दिया-
आमार मायेर मुख
आमार मायेर भाषा
आमार मायेर गान
एदेशेर आमादेर प्राणे प्राणे
प्रति बिन्दु-बिन्दु रक्ते मिशेआछे
शिशु कालेर पाठशालाय
शेखा वर्णमाला
प्रिय कोवी रवीन्द्रनाथेर लेखा, कोविता गान
एजे आमादेर सारा मोन जूड़ेआछे
एजे आमादेर चेतनाय
आगुनेर पारसमोनी होये आछे
प्रोतिपले पले जीवनेर स्वप्न देखाय
प्रोति क्षणे क्षणे बांचबार आशा जोगाय
आमार प्रिय दुक्खिनी मायेर भाषा,
वर्णमाला, प्रिय कोबीर गान
जाखुन सुनी भूलते हाबे
आमार रक्त स्रोत थेके मूछते हावे
किन्तु ए आमरा होते दीईना
ए आमारा होते देबोना
– हमारी माता का मुख, हमारी माता की भाषा समाविष्ट है हमारे प्राणों में, रुधिर में। मातृभाषा की जो वर्णमाला शैशवकाल में पाठशाला में बैठकर सीखी और रवीन्द्र ठाकुर की जिन रचनाओं से हमारा सम्पूर्ण मन संयुक्त है, जो हमारी चेतना है, जो अग्नि की पारसमणि होकर हमें प्रतिपल जीवन के स्वप्न दिखाती है और यह आशा जगाती है कि हम शेष रहेंगे, जीवित रहेंगे। लेकिन आज सुनता हूँ कि हमारी उसी प्रिय दुखियारी माता की भाषा, वर्णमाला, कवि रविठाकुर के गीत भुला देने होंगे- अपने से काटकर अलग फेंक देने होंगे परन्तु यह हमने होने नहीं दिया, न कभी होने देंगे…
यह संकल्प केवल हिन्दुओं का नहीं वरन् क्रमशः उक्त बोल हैं बंगलादेश के कवि नाजिम महमूद, जाकिल उलहक और बेबी मौदूद के। यह संकल्प उन्होंने किया है अपनी माँ से, देश-माता से कि हे लक्ष्मी माता! तुम सिर्फ पूर्व गगन की तरफ देखती रहो। सूर्योदय होगा। – लक्ष्मी मोगो! तुमी शुधू पूर्वेर आकाशे चेये थाको।
इन बंग-बंधुओं के ही स्वर में हम भी आज माता के समक्ष शुचि संकल्प क्यों नहीं लेते, क्यों नहीं 15 अगस्त के इस स्वातन्त्र्य-पर्व पर हम यह पवित्र प्रण करते कि बहुत दिन पहले, शायद 40 वर्ष पूर्व एक दिन हमने रावी नदी के किनारे जो प्रतिज्ञा की थी कि ‘हम संपूर्ण देश को स्वतंत्र करके रहेंगे- उसको पूर्ण करने के लिए हम आगे बढ़ेंगे।’ मुक्त करेंगे भारत की चप्पा-चप्पा भूमि को शत्रुओं के चंगुल से। कश्मीर का पाकिस्तान-अधिकृत भू-भाग, सिंध, विभाजित पंजाब और पूर्वी बंगाल में हम एक भी शत्रु को जीवित नहीं छोड़ेंगे। सर्वत्र फहरायेंगे स्वातन्त्र्य-पताका। अंग्रेजों ने अपनी विषभरी कूटनीति से प्रेरित हो विभाजन की जो तौक हमारे गले में डाल दी, उसे क्यों हम आज भी आभूषण समझकर मौन हैं, निष्क्रिय हैं ? संसार का वह कौन-सा संविधान है, जो गुलामी की उस तौक को शृंगार मानने की सीख देना चाहता है? ब्रिटिश-अमेरिका या चीन की तरफ निरन्तर देख-देख कर रास्ता चलने की आदत कब छूटेगी ? आज चीन की मित्रता सभी चाहते हैं, भारत से प्रतिक्रिया वश संधि की जाती है। कुछ परमाणु और उद्जन बम बनाने की योजना यदि किसी देश को ‘बड़ा राष्ट्र’ घोषित करवा सकती है तो क्या हमें हमेशा मंजीर बजाते रहने की ही शिक्षा लोकतन्त्र ने दी है ? यहिया खाँ की फौजें जब ढाका-चटगाँव की ओर बढ़ीं, उस दिन हमारी सेनाएँ लाहौर-कराची की तरफ क्यों नहीं चढ़ दौड़ीं ! सेनाएँ सक्षम हैं, समर्थ हैं- उनके पाँव में सरकार ने जंजीरें क्यों डाल रखी हैं ? भारत क्या सिर्फ शरणार्थियों का देश है और क्या हम इसे एक दिन स्वयं शरणार्थी देश बनाकर रहेंगे? उस दिन संसार का कौन स्थल, कौन पर्वत, कौन अरण्य और कौन राष्ट्र भारत को शरण देगा ? क्या भारत अमेरिका, अरब देश, चीन-रूस के शरणागत बनकर जीवित रहना चाहेगा और क्या कोई देश इस स्थिति में कभी नाम-शेष रह पाया है? इसलिए उठो! जागो! शक्ति-सम्पन्न बनो।
शस्त्र-सन्नद्ध हो। शत्रु-निपात करो।…
‘भांगो कोरो चूरमार, लाति मारो जालिमेर तख्ते’
तोड़कर चूर-चूर कर दो अन्यायी सिंहासन। खत्म कर दो यह विदेशी करिश्मा, यह कृत्रिम विभाजन। तोड़ो दीवार। समान आलोक विकीर्ण होने दो। सिंध-सतलज और पद्मा के बीच कोई जंजीर बाकी न रहे, बाधक न बने। हर लहर स्वतन्त्र हो। बिन्दु-बिन्दु मुक्त हो। शत्रु-शिर छिन्न हो गिरे लालकिले के द्वार पर। वही होगा समग्र देश-माता का मुक्ति-पर्व।
(राष्ट्रधर्म, सम्पादकीय, अगस्त, 1971)













