
अपनी पुस्तक ‘थाॅट्स आॅन पाकिस्तान’ में भीमराव आम्बेडकर ने मुस्लिम मानसिकता का जो विश्लेषण प्रस्तुत किया है, उसका सार यह है कि मुसलमान सामाजिक सुधारों के विरोधी हैं और वे सारी दुनिया में पिछड़े हुए हैं। इस्लाम जिस भाईचारे की वकालत करता है, वह दुनिया के सब मानवों का भाईचारा नहीं है। वह केवल मुसलमानों का मुसलमानों के लिए ही भाईचारा है। गैर-मुसलमानों के लिए वह सिवा घृणा और शत्रुत्व के और कुछ नहीं है। मुसलमान केवल उसी राष्ट्र के लिए वफादार होता है, जो मुसलमान द्वारा शासित हो। जो भूमि मुसलमानों द्वारा शासित नहीं है, वह उसके लिए शत्रु-भूमि है। इस्लाम किसी भी वफादार मुसलमान को यह इजाजत नहीं देता कि वह हिन्दुस्तान को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना भाई माने। आक्रामक मनोवृत्ति मुसलमानों के स्वभाव का अंग है। वह हिन्दुओं की दुर्बलता का फायदा उठाता है और गुण्डागर्दी करता है।
मन्दिर प्रवेश के सम्बन्ध में जब बंगाल के कुछ रूढ़िवादी हिन्दुओं ने तृतीय गोलमेज परिषद् में भाग ले रहे गजनवी नामक एक मुसलमान प्रतिनिधि को तार भेजकर उससे प्रार्थना की थी कि हरिजनों के मन्दिर-प्रवेश के विरुद्ध मुसलमान उन्हें समर्थन दें और उसी शिकायत को परिषद के सामने रखें, तब डाक्टर आम्बेडकर ने चेतावनी देते हुए कहा था कि रूढ़िवादी हिन्दुओं का अपने धर्म की रक्षा के लिए मुसलमानों से प्रार्थना करना हिन्दू सुधारवादियों के लिए एक गम्भीर चेतावनी है- हालाँकि डाक्टर आम्बेडकर को ऐसी कोई व्यवस्था मान्य नहीं थी, जिसमें दलित वर्ग को शेष हिन्दू बहुमत की दया पर छोड़ दिया जाये, क्योंकि उन्हें विश्वास नहीं होता था कि उन दिनों सामान्य हिन्दुओं की मानसिकता में दलित वर्ग को न्याय मिल सकेगा।
किन्तु उनका मन किसी दिशा में कार्य करता था, इसका पता द्वितीय गोलमेज परिषद की एक घटना से मिलता है। उन्होंने जब देखा कि परिषद् में दिये गये उनके भाषणों का उपयोग अंग्रेज हिन्दुओं के विरुद्ध मुसलमानों की माँगों का समर्थन करने के लिए कर रहे हैं, तब उन्होंने चुपके से एक ज्ञापन गोलमेज परिषद् के अध्यक्ष तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमन्त्री रैमजे मैकडोनेल्ड के पास भिजवा दिया, जिसमें उन्होंने मुसलमानों के विरुद्ध हिन्दू-हितों का समर्थन किया था।
बाबा साहब ने समाज को कोसा, पर तोड़ा नहीं, गाली दी, पर झगड़ा नहीं होने दिया। महाड़ के चवदार तालाब से पानी लेने के अधिकार के प्रश्न पर जहाँ से ईसाई, मुसलमान ही नहीं, कुत्ते बिल्ली भी पानी पी सकते थे किन्तु पानी को अपवित्र कर देने के भय से मात्र अछूत उसे छू नहीं सकता था, डाक्टर आम्बेडकर ने दस हजार लोगों को साथ लेकर शान्तिपूर्ण सत्याग्रह किया। उस समूह में हजारों बन्धु ऐसे थे; जिन्हें प्रथम महायुद्ध का प्रत्यक्ष अनुभव था। नेता के मुख से एक रोष भरे शब्द की देर भर थी कि महाविनाश लीला होने और रक्त की नदियाँ बहने में जरा भी देर नहीं लगती। किन्तु अपने नेता की आज्ञा शिरोधार्य कर उन लोगों ने गजब का धैर्य-प्रदर्शन किया। इसके दो घण्टे बाद अवश्य कुछ रूढ़िवादी हिन्दुओं ने झूठी अफवाह उड़ाकर शेष बचे प्रतिनिधियों पर आक्रमण कर उन्हें घायल कर दिया था।
बाबा साहब ने अस्पृश्यों को अधिकार दिलाने के लिए ब्रिटिश सरकार की सहायता अवश्य ली, किन्तु ब्रिटिशों के चंगुल से भारत को मुक्त कराने की बात डंके की चोट पर कही। उन्हांेने स्वतन्त्र भारत की मन्त्रि-परिषद में मन्त्री-पद विभूषित किया, उसके चिपके नहीं। अन्त में अपने तीन लाख अनुयाइयों के साथ धर्मान्तरण किया किन्तु राष्ट्रान्तरण नहीं होने दिया। नागपुर की दीक्षा-भूमि में आयोजित उस विशाल समारोह में उद्बोधन देते हुए उन्होंने कहा था-
”मैंने गांधी जी से एक बार कहा था कि यद्यपि मैं आप से अस्पृश्यता के प्रश्न पर सहमत नहीं हूँ, तथापि जब समय आयेगा, तब मैं ऐसा मार्ग चुनूँगा, जो देश के लिए कम से कम अहितकर होगा। और, आज मैं बौद्धमत अंगीकार करते हुए देश की सबसे बड़ी सेवा कर रहा है; क्योंकि बौद्धमत भारतीय संस्कृति का ही अंग है।
अस्पृश्यता के बारे में कांग्रेस की नीतियों की आलोचना करते हुए उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि- कांग्रेस इस मामले में प्रामाणिक नहीं है। यदि वह प्रामाणिक होती तो खादी पहनने के समान अस्पृश्यता के निवारण को कांग्रेस की सदस्यता की अनिवार्य शर्त बनाती। ऐसे भी किसी सदस्य को कांग्रेस का सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए था; जो अपने घर में किसी अस्पृश्य स्त्री या पुरुष को नौकर न रखे अथवा किसी अस्पृश्य विद्यार्थी के साथ सप्ताह में कम से कम एक बार भोजन न करे। यदि ऐसी शर्त लगायी गयी होती, तो आज ऐसा हास्यास्पद दृश्य देखने को न मिलता कि जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ही हरिजनों के मन्दिर-प्रवेश का विरोध कर रहे हैं।’
डा. आम्बेडकर यह भली-भाँति समझते थे कि केवल कुछ वैधानिक अधिकार प्राप्त हो जाने मात्र से अस्पृश्यता की समस्या समाप्त नहीं हो जायेगी। पोर्ट सैद बंदरगाह से अस्पृश्यता विरोधी संघ के महामंत्री ठक्कर बाप्पा को पत्र लिखते हुए वे कहते हैं- ‘स्पृश्य और अस्पृश्य लोगों को केवल कानून के सहारे जोड़कर नहीं रखा जा सकता और पृथक् निर्वाचन-मंडलों के स्थान पर संयुक्त निर्वाचक मंडल रचकर तो कतई नहीं। एक ही बात जो दोनों को जोड़ सकती है, वह है प्यार। दलित वर्ग की मुक्ति का समय तभी आयेगा, जब सवर्ण हिन्दुओं को यह अनुभव होगा अथवा वे सोचने के लिए बाध्य होंगे कि उन्हें अपना आचरण बदलना चाहिए। मैं हिन्दुओं की मनोवृत्ति में क्रान्ति चाहता हूँ।“
समाज संगठन के लिए साझे त्योहारों को साथ-साथ मनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा था- ‘हिन्दुओं द्वारा मनाये जाने वाले उत्सव समान होते हुए भी जातिगत आधार पर अलग-अलग मनाये जाने के कारण उनके द्वारा सद्भावना का जागरण नहीं हो पाता। व्यक्ति को समूह की गतिविधियों में जब इस प्रकार भागीदार बनाया जाता है कि वह अनुभव करें कि समूह की सफलता-असफलता ही उसकी अपनी भी सफलता-असफलता है, तभी लोगों में आपसी बन्धनों का निर्माण होता है और उन सबको मिलकर समाज बनता है। जाति-प्रथा इन साझे कार्यक्रमों को रोकती है और इसी कारण हिन्दू ऐसे समाज के रूप में गठित नहीं हो सके जिसका एक संघबद्ध जीवन हो और जिसकी अपनी स्वयं की अस्मिता हो।’ व
(राष्ट्रधर्म, अप्रैल, 1989)













