
शिव की नगरी काशी में जन्मी निशा को माता-पिता से कला का संस्कार मिला, यद्यपि कला का आग्रह उनमें नैसर्गिक था। समय के साथ यह आग्रह बढ़ता गया। आरम्भ में लोक कलाओं के प्रति सहज आकर्षण ने रंगोली, मेंहदी, लोक नृत्य तथा लोक गायन आदि में निशा ने अद्भुत प्रस्तुति दी। आगे चलकर चित्रकला में उनकी रुचि विकसित हुई। यह रुचि बहुत ही सहज थी, नैसर्गिक थी। निशा भी इसके कारण से अनभिज्ञ हैं। सृजन में नैरन्तर्य बना रहा, कला उत्तरोत्तर विकसित होती रही। लगभग 40 वर्षों की साधना एवं समर्पण से निशा ने कुछ अद्भुत, अतुलनीय चित्रों की रचना की। राजनीति विज्ञान की आचार्य, निशा का किसी प्रकार के कला-प्रशिक्षण से कोई सम्बन्ध नहीं है। वस्तुतः नैसर्गिक कौशल्य प्रशिक्षण का मोहताज नहीं होता, निशा भी नहीं हैं। उनकी कृतियाँ ‘अनुग्रह की अभिव्यक्ति’ हैं। कृतियों को अलंकृत करती भाषा के शब्द कम पड़ जाते हैं। मर्मज्ञ मूक हो जाते हैं तो आस्थावान कागज पर ‘प्राणप्रतिष्ठा’ देख नतमस्तक। उनकी अभिव्यक्ति में परम के भिन्न-भिन्न रूप हैं। प्रकृति की अकल्पनीय-कल्पना है। सौंदर्य की प्रतिष्ठा कलाकृतियों के केंद्र में है। प्रकृति पूजक एवं सगुणोपासक आर्यों ने अपने आराध्य के विभिन्न रूपों को अपनी आराधना में संरक्षित किया है। निशा इन्हीं रूपों को पुनः अपनी शैली में सृजित करती हैं। यह सृजन कहीं मोहक रंगों में समाहित है तो कहीं उनकी विशिष्ट श्वेत-श्याम शैली में।
जिज्ञासु दर्शक, कला-समीक्षक कई बार यह जानना चाहते हैं कि, ”परम के विभिन्न रूपों की अभिव्यक्ति ही क्यों ?“ प्रत्युत्तर में निशा चुप रहती हैं क्योंकि वह ‘अभिव्यक्ति को अनुग्रह’ तो स्वयं को ‘माध्यम’ मात्र मानती हैं। पुनः पुनः प्रश्नावृत्ति होने पर वे कहती हैं, ”ब्रह्म के अनंत रूप हैं, एक ही रूप का सृजन आप अनगिनत रूप में कर सकते हैं। मेरे सृजन में विषयाभाव कभी होगा ही नहीं। अपने कथन का विस्तार करते हुए वे कहती हैं कि, ”चित्र अपनी अनुकृति का आदेश लेकर मुझ में बिंबित होने लगते हैं। यह सृजन का पहला चरण होता है। कागज पर उतारने और फिर उसे पूर्ण करने में एक लंबा समय व्यतीत होता है। इस श्रमसाध्य यात्रा में कल्पना सर्वाेपरि होती है। मेरे चित्र धैर्य, तपस्या एवं समर्पण का प्रतिफल हैं। इनसे मिलने वाली संतुष्टि गूँगे का गुड़ है।
‘महिषासुर मर्दिनी’ चित्र की चर्चा होने पर वे कहती हैं, ”श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ मेरी दिनचर्या का अभिन्न अंग है। माँ दुर्गा के प्रति जिज्ञासु भाव ने वह सब कुछ पढ़ने को प्रेरित किया जो उनसे संबंधित था। मर्दन के समय महिषासुर के भिन्न-भिन्न रूप देवी के साथ ब्रह्मा, विष्णु, महेश की आकृति, इन तथ्यों को जानने के क्रम में एक लंबा समय व्यतीत हुआ। जब ‘माँ’ का रूप मेरे समक्ष बिंबित होने लगा तो सृजन प्रारंभ हुआ। यह आदेश ही तो है।“
‘श्रीकृष्ण’ के कई रूप उनके चित्रों में प्रतिष्ठित हैं। जिसके विषय में वे कहती हैं, ”कृष्ण तो अनंत हैं, उनके रूप की कल्पना असीम। लड्डू गोपाल, बाल गोपाल, कान्हा, कन्हाई, कन्हैया, साँवरे, रसिया, मुरली मनोहर, कृष्ण, योगेश्वर कृष्ण, विट्ठल, नाथद्वारा आप जिस रूप में उन्हें देखना चाहें। वस्तुतः यह प्रकृति उनका प्रतिबिंब है। मेरी श्वेत-श्याम कृति में वह ‘नाथद्वारा’ तथा राधा के साथ ‘जुगल किशोर’ रूप में विद्यमान हैं। ‘कालिय-मर्दन’ एवं ‘अभिसार’ रंगीन कृतियाँ हैं। निशा का मानना है कि जनमानस में हमारी पौराणिक कथाएँ इस प्रकार रची-बसी हैं कि चित्रों का कथ्य सहज ही संप्रेषित हो जाता है। ‘कालिय-मर्दन’, ‘जुगल किशोर’ जनमानस में बसे कृष्ण के चर्चित रूप हैं। दोनों ही शैलियों में ‘विघ्नहर्ता विनायक’ भी अपने अपूर्व रूप में चित्रित हैं। श्वेत-श्याम तथा रंगीन ‘शक्ति स्वरूपा’ देवियों के चित्र निशा की चित्र कला शैली को दृढ़ता प्रदान करते हैं। उनकी अस्मिता प्रौढ़ होती है। रंगों और बिंदुओं के संयोजन को भलीभाँति देखने के लिए ‘मैग्नीफाइंग ग्लास’ की जरूरत पड़ती है। ‘ग्राफ पेन’ से बनाये गये श्वेत-श्याम चित्र दर्शकों की नजरों में ‘नैनो टेक्नोलॉजी’ का प्रतिनिधित्व करते हैं।
जल रंग तथा दो नंबर के ब्रश से चित्रों में रंग भरने के पूर्व निशा अपनी साँस रोक लेती हैं, वे कहती हैं, ”क्षणभर का कंपन भी चित्रों के लिए भारी पड़ सकता है।“
उत्तर प्रदेश के पडरौना तहसील की पुत्री तथा गोरक्ष नगर (गोरखपुर) की पुत्रवधू निशा की कला में लोक का सहज एवं सुन्दर स्पर्श है। कभी वह कोहबर में उकेरे गए लक्ष्मी-गणेश की चित्रावली से प्रभावित होती हैं तो कभी प्रकृति के मनोरम रूप से।
दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने वाली निशा ने शहर के स्वाद को भी महसूस किया है। किंतु कला के प्रति आकर्षण एवं राग भाव उत्पन्न करने में वे लोक कलाओं की भूमिका सर्वाेपरि मानती हैं।
लोक कलाएँ जीवन में राग, रंग एवं उत्सव का संचार करती हैं। निशा प्रभावित हैं बिहार के मधुबनी, उड़ीसा के पट्ट चित्र, तथा तिब्बत की थंका चित्रावलियों से। इन चित्रों में नियोजित प्राकृतिक रंग उन्हें संवेदित करते हैं।
निशा की नवीनतम कृति ‘श्री राम दरबार’ है जो कि लगभग सात वर्षों का प्रतिफलन है। उनका परिवार लगभग सात-आठ दशकों से श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या से जुड़ा हुआ है। परिवार के साथ अयोध्या आना ही इस कृति के बीजारोपण की भूमिका में है। कृति की पूर्णता को वह ईश्वर का प्रसाद मानती हैं।
निशा की अनेक एकल (इंडिया हैबिटेट सेंटर, आई.सी.सी. आर, क्राफ्ट विलेज, अमृता कला वीथिका, पूर्वांचल संग्रहालय आदि) प्रदर्शनियाँ आयोजित की गई हैं तथा उन्होंने कई प्रदर्शनियों में भाग भी लिया है। 2023 सितंबर माह, बीकानेर हाउस, दिल्ली में उनकी एकल प्रदर्शनी का आयोजन प्रस्तावित है।













